हलचल

कैदियों को इंटरनेट चलाने के लिए फोन देने चाहिए, AAP नेता ने अपनी थीसिस में बताया

क्या कोई राज्य अपने कैदियों पर निगरानी रखते हुए उन्हें फोन और इंटरनेट के इस्तेमाल करने की इजाजत दे सकता है ?

जी हां दे सकता है और यह कहना है आम आदमी पार्टी के एक नेता का जो लुधियाना लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं।

यह सब बताया गया है आप उम्मीदवार तेजपाल सिंह गिल जिनकी पीएचडी थीसिस पंजाब-ए स्टेकहोल्डर परसेप्शन है जो कि जेल का संगठन और कार्यशील मॉडल है। 32 साल के तेजपाल को उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू की उपस्थिति में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में बीते रविवार को डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजा गया।

एक राज्य में, जहां जेल के अंदर बर्थडे सेलीब्रेशन और बर्थडे सेल्फी की तस्वीरें नियमित रूप से फेसबुक पर आ जाती हैं जिस पर गिल ने अपनी थीसिस में कुछ दिलचस्प संभावनाएं बताई हैं।

थीसिस में कहा गया है कि “जेलों में सेल फोन का इस्तेमाल करना कैदियों के लिए एक आम बात हो गई है… कैदी फेसबुक पर लाइव आने या अपनी तस्वीरें अपलोड करने में गर्व महसूस करते हैं। यह चिंता का गंभीर कारण है क्योंकि इससे न केवल जेलों की सुरक्षा को खतरा है, बल्कि सिस्टम का मजाक भी बनता है”

बेल्जियम के एंटवर्प में बेवरन जेल का उदाहरण देते हुए आगे बताया गया कि, जहां कैदियों को कथित तौर पर किताबें पढ़ने और दूसरों के बीच कानूनी मदद लेने के लिए इंटरनेट तक सीमित पहुंच दी जाती है।

भारत की जेलों में यह समस्या दो तरीकों से दूर की जा सकती है। एक सेल फोन पर पूरी तरह से बैन लगाकर और दूसरा कैदियों को जेल में सेल फोन का उपयोग उनके खुद के खर्चे पर करने दिया जाए और सिक्योरिटी के लिए उनकी चैट्स और कॉल्स रेगुलेट किए जाएं।

एंटवर्प की जेल में कैदियों को कॉल करने और फिल्में डाउनलोड करने के लिए इंटरनेट की अनुमति मिलती है, अब गिल के सिद्धांत में प्रिज़नक्लाउड सिस्टम के बारे में बताया गया है जो कुछ साइटों तक पहुंच प्रदान करता है। यह एक ऐसा कदम है जो कैदियों को शिक्षा के अवसर भी प्रदान कर सकता है।

अपनी रिसर्च के दौरान गिल ने पंजाब की दो जेलों – फरीदकोट मॉडर्न जेल और कपूरथला मॉडर्न जेल का दौरा किया, जहाँ उन्होंने कुल 300 कैदियों के इंटरव्यू किए।

इंटरव्यू के बाद उन्हें लगा कि कैदियों को इंटरनेट एक्सेस करने और उनके परिवार / दोस्तों को कॉल करने की अनुमति दी जानी चाहिए लेकिन कुछ नियमों के तहत।

इससे आगे गिल कहते हैं कि मेरे पास अभी जेल के कैदियों के कम से कम 50 सेलफोन नंबर हैं। करीब 95 फीसदी कैदियों के पास सेलफोन है। तो फोन पर बैन वास्तव में कितना सफल है? इसके बजाय, उन्हें सेलफोन रखने, अपने परिवारों तक सीमित कॉल करने और शिक्षा, मनोरंजन या कानूनी मदद के लिए इंटरनेट तक पहुंचने की अनुमति दी जानी चाहिए।

गिल द्वारा उनकी थीसिस में जेलों के अंदर ड्रग्स की आसान उपलब्धता, वॉशरूम में गंदगी और स्वच्छता, भोजन की खराब गुणवत्ता, बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और कैदियों की वास्तविक मांगों के प्रति प्रशासन रवैया जैसे मुद्दे भी बताए गए हैं।

sweta pachori

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