हलचल

जलवायु परिवर्तन ने भारत की आर्थिक वृद्धि को 30% तक धीमा कर दिया है!

ग्लोबल वार्मिंग के लिए जो कम से कम जिम्मेदार हैं वो सबसे ज्यादा इसी चीज का नुकसान झेलेंगे। गरीब देश जो जलवायु परिवर्तन में बहुत कम योगदान देते हैं। उनके इलाके गर्म हो रहे हैं जहां अतिरिक्त वार्मिंग सबसे अधिक तबाही का कारण बनती है।

सीरिया के लंबे समय तक सूखे, दक्षिण एशिया के विनाशकारी मानसून की बाढ़, और दक्षिण-पूर्वी अफ्रीका में चक्रवात इडाई, रिकॉर्ड पर तीसरा सबसे घातक चक्रवात, जैसे गंभीर मौसम की संभावना देखने को मिल रही है।

ये घटनाएँ असमय मृत्यु, विस्थापन और फसल बर्बादी से जुड़ी हैं। इसके परिणामस्वरूप अनुमान है कि आने वाले दशकों में जलवायु परिवर्तन से गरीब व गर्म देशों की अर्थव्यवस्थाओं को गंभीर नुकसान होगा। लेकिन वहीं हवा में सबसे ज्यादा सीओ2 मिलाने वाले ठंडे और अमीर देशों को शायद उतना नुकसान ना हो। जैसा कि नए शोध से पता चलता है जलवायु परिवर्तन भविष्य की चिंता नहीं है। यह आर्थिक अन्याय पहले से ही 60 वर्षों से चल रहा है।

नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज की कार्यवाही में प्रकाशित अध्ययन में 1961 से 2010 के बीच अलग-अलग देशों की जीडीपी प्रति व्यक्ति की तुलना की गई जो किसी व्यक्ति के जीवन स्तर के बारे में बताता है। तब इन आंकड़ों पर जलवायु मॉडल का उपयोग किया गया और पता लगाया गया कि जलववायु परिवर्तन के बिना प्रत्येक देश की जीडीपी क्या रहती है।

कई गरीब देशों की अर्थव्यवस्था पिछले 50 वर्षों में तेजी से बढ़ी है, हालांकि अक्सर महान सामाजिक और पर्यावरणीय लागत और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लाभ के कारण ऐसा हुआ लेकिन विकास को जलवायु परिवर्तन द्वारा काफी हद तक रोका गया है। अमीर और गरीब देशों के बीच प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद का अंतर जलवाय स्थिर दुनिया की तुलना में 25% अधिक है। जिससे पता चलता है कि विकास का फेक्टर कहीं ना कहीं जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होता है।

सबसे कम कार्बन उत्सर्जन वाले 36 देशों में से जो दुनिया के सबसे गरीब और सबसे गर्म देशों में से भी हैं उनमें से 34 को बिना वार्मिंग के बाकी देशों की तुलना में आर्थिक रूप से कमी का सामना करना पड़ा है। उन देशों को जीडीपी प्रति व्यक्ति औसतन 24% का नुकसान हुआ है। सबसे गरीब 40% देश, जिनमें से अधिकांश उप-सहारा अफ्रीका, एशिया और मध्य और दक्षिण अमेरिका में स्थित हैं, पिछली आधी शताब्दी मं उनमें जीडीपी का 17% से 31% के बीच नुकसान देखा गया है।

भारत, प्रति व्यक्ति सबसे कम उत्सर्जनकर्ताओं में से एक है और हाल के दशकों में एक आर्थिक विकास चैंपियन माना गया है लेकिन जलवायु परिवर्तन ने इसकी प्रगति को 30% धीमा कर दिया है। जबकि देश के सर्विस सेक्टर में उछाल आया है लेकिन कृषि क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ है। अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में तीन गुना वृद्धि और गंभीर सूखे ने फसल की पैदावार को कम कर दिया है और अकेले कृषि उद्योग को प्रति वर्ष 9 से 10 बिलियन डॉलर का नुकसान झेलना पड़ रहा है।

कई तरह की घटनाएं भी आर्थिक विकास में कमी लाती हैं जिसमें बाढ़ से नुकसान, भुकंप आदि। भारत की लगातार तेज गर्मी जो अब नियमित रूप से 45 ℃ से ऊपर चढ़ी रहती है। यह उत्पादकता को कम करते हैं, हजारों को मारते हैं, और हजारों आत्महत्या करते हैं।

हालांकि दुनिया के सबसे धनी देशों के लिए जलवायु परिवर्तन ने उतना नुकसान नहीं किया। 19 सबसे अधिक उत्सर्जन करने वाले देशों में से 14 अब खुद को बेहतर आर्थिक स्थिति में पाते हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नुकसान उठाना पड़ा है लेकिन यह 0.2% है जो बहुत कम है। जबकि ब्रिटेन खुद को 10% बेहतर पोजिशन में पाता है।

जैसा कि तेजी से स्पष्ट हो रहा है, जलवायु परिवर्तन या असमानता के लिए कोईआसान समाधान नहीं है। ऐसा होता रहा तो यह वैश्विक असमानता को गहरा करेगा। दुनिया के सबसे धनी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मौलिक रूप से बदलने के साथ, हमें मांग करनी चाहिए कि पिछले अन्याय के लिए भुगतान किया जाए और ग्लोबल साउथ के लोन को रद्द कर दिया जाए। स्थानीय उद्योगों और भूमि के निजीकरण को उलट दिया जाए। तभी वैश्विक असमानता से वास्तव में निपटा जा सकता है।

Neha Chouhan

12 साल का अनुभव, सीखना अब भी जारी, सीधी सोच कोई ​दिखावा नहीं, कथनी नहीं करनी में विश्वास, प्रयोग करने का ज़ज्बा, गलत को गलत कहने की हिम्मत...

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