जयंती: राजनीतिक मतभेद की वजह से विजयाराजे सिंधिया के अपने बेटे से खत्म होने लगे थे पारिवारिक रिश्ते

Views : 2736  |  3 minutes read
Vijaya-Raje-Scindia-Biography

देश की राजनीति में सिंधिया राजघराने का आज भी बड़ा नाम है। जीवाजी राव सिंधिया से लेकर राजमाता विजयाराजे और वर्तमान की राजनीति में यशोधरा राजे, वसुंधरा राजे और ज्योतिरादित्य सिंधिया राजघराने के नाम को सहेजे हुए हैं। राजघराने की शुरूआती राजनीति के दिनों से ही सभी राजनेता हिंदू महासभा, जनसंघ और अब कुछ बीजेपी में रहकर कांग्रेस विरोधी राजनीति के लिए जाने जाते हैं। राजमाता विजयाराजे सिंधिया का प्रभाव मध्य प्रदेश की राजनीति में आज भी देखा जा सकता है।

उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत भले ही कांग्रेस से की हो, लेकिन एक बार पार्टी छोड़ने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज 12 अक्टूबर को राजमाता विजयराजे सिंधिया की 101वीं जयंती है। ऐसे में इस मौके पर जानते हैं उनकी राजनीतिक और निजी ज़िंदगी से जुड़ी कुछ ख़ास बातें..

राजनीति में था राजघरानों का रसूख

विजयाराजे भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से रही है। मध्य प्रदेश की राजनीति में ग्वालियर के जय विलास महल को हमेशा से केंद्र माना जाता रहा है। आज़ादी के बाद से ही यहां राजघराने रजवाड़ों की राजनीति होती थी। सिंधिया खानदान का रसूख इतना गहरा रहा कि चाहे परिवार के कुछ नेता कांग्रेस से रहे पर फिर भी 1984 के चुनावों में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता को भी यहां से हार का सामना करना पड़ा। रजवाड़ों को जोड़कर भारत के अस्तित्व में आने के बाद से ही सिंधिया परिवार की राजनीति की शुरूआत होती है। जीवाजी राव सिंधिया यहां के आखिरी महाराजा हुए।

विजयाराजे सिंधिया की राजनीतिक शुरूआत

रजवाड़ों की राजनीति करने वाले जीवाजी को शुरू से ही लोकतंत्र के विचारों में कोई खास दिलचस्पी नहीं रही। 1957 में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से मुलाकात के बाद जीवाजी सिंधिया ने नेहरू के सामने लोकतंत्र की नीतियों पर अपनी नाराजगी जाहिर की। आखिरकार जीवाजी के दबाव और रसूख की बदौलत आसानी से उनकी पत्नी विजयाराजे सिंधिया के राजनीतिक सफर की शुरूआत हो गई। मध्य प्रदेश की गुना सीट से विजयाराजे सिंधिया को कांग्रेस ने अपने टिकट पर चुनाव लड़वाया। उनके सामने चुनाव लड़ रहे हिंदू महासभा के उम्मीदवार को 60 हज़ार वोट से करारी हार का सामना करना पड़ा।

कांग्रेस छोड़ने के पीछे ये रहे कारण

मध्य प्रदेश में पूर्व सीएम और इंदिरा गांधी के करीबी द्वारका प्रसाद मिश्र के कार्यकाल के दौरान ग्वालियर में छात्रों के आंदोलन को सरकार ने गोलियां और लाठीचार्ज कर कुचल दिया जिसके बाद डीपी मिश्र से आपसी मतभेद के चलते विजयाराजे कांग्रेस छोड़ दी। आखिरकार विजयाराजे ने जनसंघ का हाथ थामा और विधानसभा में विपक्ष की नेता बनी। विजयाराजे और कांग्रेस से नाराज चल रहे नेता गोविंद ने मिलकर डीपी मिश्र की सरकार गिरा दी।

25 जनवरी, 2001 को राजमाता के निधन के बाद उनकी वसीयत को लेकर कई विवाद सामने आए। माधवराव और ज्योतिरादित्य को अरबों की संपत्ति से बेदखल होने की नौबत तक आ गई। माधवराव के कांग्रेस में चले जाने के कारण वो आखिरी समय तक अपने बेटे से इतनी नाराज थी कि उन्होंने अपनी लिखी वसीयत में अपने बेटे को अंतिम संस्कार में आने के लिए मना कर दिया था।

Read More: लगातार 9 बार लोकसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड है माधवराव सिंधिया के नाम

COMMENT