बर्थडे स्पेशल: किसी हिट फिल्म से कम नहीं थी एक्टर प्राण की ज़िंदगी

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बॉलीवुड एक्टर प्राण ने अपने​ पांच दशक के फिल्मी कॅरियर में 350 से अधिक फिल्मों में काम किया। अपने इस लंबे कॅरियर में उन्होंने कई बेहतरीन फिल्में की और अपनी अदायगी से लाखों लोगों के दिल पर राज़ किया। उन्होंने हिंदी सिनेमा में एक कैरेक्टर एक्टर और विलेन के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई। प्राण साहब का जन्म 12 फरवरी, 1920 को लक्ष्मी चौक, लाहौर में एक संपन्न पंजाबी इंजीनियर के घर में हुआ था। उनका पूरा नाम प्राण कृष्ण सिकंद है। ऐसे में प्राण साहब की बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जानते हैं उनके बारे में कई दिलचस्प बातें..

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एक फोटोग्राफर बना एक्टर

प्राण शुरू से अभिनेता नहीं बनना चाहते थे। फोटोग्राफी वह करियर था जिसके लिए उन्होंने काफी स्ट्रगल किया। दिल्ली में रहते हुए उन्होंने फोटोग्राफी में प्रोफेशनली काम भी किया, बाद में वे लाहौर चले गए। एक पान की दुकान थी, जहां वे हमेशा अपने दोस्तों के साथ खाने के बाद जाया करते थे। यही वह जगह है जहाँ लेखक वली मोहम्मद वली ने उन्हें देखा और एक्टिंग के लिए उनसे संपर्क किया।

वली श्री दलसुख पंचोली के लिए एक लेखक थे जो प्रसिद्ध निर्माता और स्टूडियो मालिक थे। वे उस समय ‘यमला जट्ट’ नामक एक पंजाबी फिल्म बनाने की प्लानिंग कर रहे थे। वली ने सोचा कि प्राण फिल्म में एक मुख्य किरदार के लिए फिट बैठते हैं और चाहते थे कि प्राण ही उसे करे। प्राण ने हामी भर दी और वली ने उन्हें अपना कार्ड देकर अगले दिन सुबह 10 बजे मिलने के लिए कहा। लेकिन 19 साल के प्राण ने वास्तव में वली की बात को उतना सीरियसली नहीं लिया और ना वली से संपर्क किया।

अगले शनिवार को जब वह प्लाजा सिनेमा में एक मैटिनी शो के लिए गए हुए थे तो वे फिर से वली से टकरा गए। वली ने प्राण से कहा कि मैंने भरोसा किया था और निर्माताओं से भी कहा कि वे किसी और को साइन न करें। इस पर प्राण को थोड़ा बुरा फील हुआ और उन्होंने कहा कि वे अगले दिन ज़रूर आएंगे। लेकिन वली इस बार कोई चांस लेने के मूड में नहीं थे। वली ने प्राण का एड्रेस नोट किया और अगले दिन खुद उन्हें लेने पहुंचे। फोटो सेशन और एक इंटरव्यू के बाद प्राण ने मुख्य विलेन की भूमिका के लिए फिल्म साइन कर दी। ‘यमला जट्ट’ बड़ी हिट साबित हुई। ये साल था 1940 का।

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नूरजहाँ के साथ किया हिंदी डेब्यू

प्राण की तीसरी फिल्म ‘खानदान’ (1942) कई वजहों से खास थीं। यह हिंदी में उनकी पहली फिल्म थी और उनकी ऐसी भी पहली ही फिल्म थी जिसमें वे लीड रोल में नजर आए। फिल्म में उनके साथ नजर आईं नूरजहां जो उनकी भी पहली फिल्म थी। मलाइका-ए-तरन्नुम के लिए फिल्म में ईंटों का स्टैंड बनाया गया ताकि क्लोज अप शॉट में वे प्राण के बराबर आ सके।

लाहौर से बॉम्बे तक का सफ़र

वर्ष  1947 आ चुका था और विभाजन के कुछ महीनों पहले प्राण को लाहौर छोड़ना पड़ा। भारत आजादी हासिल करने वाला था। दंगों और सांप्रदायिक साजिशों की हवा तेज हो चुकी थी। प्राण ने अपनी पत्नी शुक्ला, अपनी भाभी और अपने लगभग एक साल के बेटे को लाहौर में दंगों की भनक लगते ही सुरक्षा के लिए इंदौर भेज दिया। लेकिन खुद वहीं रूके रहे। 11 अगस्त, 1947 को प्राण के बेटे का पहला जन्म दिन था। उनकी पत्नी ने अपने बेटे का पहला जन्मदिन मनाने से इनकार कर दिया जब तक कि प्राण इंदौर नहीं आते। 10 अगस्त को प्राण इंदौर पहुंच गए।

अगले दिन, लाहौर में दंगों में लोगों के मारे जाने की खबर फैलने लगी और प्राण वापस लाहौर नहीं जा सकते थे। अब वे फिल्मों में ही अपना करियर बनाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने बॉम्बे को ही चुना। प्राण 14 अगस्त को मुंबई पहुंचे और यहां उन्होंने ताज होटल में कमरा बुक किया। लेकिन कुछ ही समय में असलियत को प्राण पहचान चुके थे कि मुंबई के आगे 20 फिल्में जो उन्होंने लाहौर में की थीं वो कुछ भी नहीं थीं। छह महीने से अधिक समय तक काम न मिलने के बाद वे छोटे होटलों में शिफ्ट हो गए और आखिरकार उसे अपनी पत्नी के गहने बेचने पड़े।

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नो चाइल्ड नेम प्राण

जब प्राण को लोग जानने लगे थे तो कुछ पत्रकारों ने बॉम्बे, दिल्ली, पंजाब और यूपी में स्कूलों और कॉलेजों में एक सर्वे किया और पता चला कि एक भी लड़के का नाम प्राण नहीं था। लोगों ने उन्हें एक विलेन के रूप में देखा था और एक बेहतरीन छवि लोगों के बीच बन चुकी थी।

प्राण ने अवॉर्ड को कहा ना

1973 में सोहनलाल कंवर की ‘बेईमान’ ने फिल्मफेयर अवार्ड जीते। सात अवार्ड में प्राण के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता भी शामिल था, लेकिन अभिनेता ने इस पुरस्कार को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि जज कमेटी को ‘बेईमान’ के लिए शंकर-जयकिशन को सर्वश्रेष्ठ म्यूजिक डायरेक्शन का अवार्ड नहीं देना चाहिए था, बल्कि ‘पाकीज़ा’ को यह मिलना चाहिए था।

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दिल दोस्ती एक्स. दिलीप कुमार के साथ

प्राण दिलीप कुमार और राज कपूर के बहुत करीब थे। फिल्म इंडस्ट्री में उनका काफी गहरा जुड़ाव था। प्राण ने दिल दिया दर्द लिया (1966) में अभिनय किया, जिसमें दिलीप ने उन्हें अपनी भूमिका को आकार देने में मदद की।जब दिलीप की शादी हो रही थी, प्राण कश्मीर में शूटिंग कर रहे थे। भारी बारिश के बावजूद वह अपने दोस्त की शादी में शामिल होने के लिए बॉम्बे पहुँचने में कामयाब रहे। राज कपूर सहित पूरा गिरोह शराब के नशे में धुत हो गया, दिलीप के शादी की पहली रात को बेडरूम के दरवाजे को तब तक वे बजाते रहे, जब तक वह उन्हें नमस्ते कहने के लिए दिलीप ने दरवाजा नहीं खोला।

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लुक को अलग अंदाज में पेश करते थे प्राण साहब

प्राण साहब फिल्म में अपने लुक को काफी अलग तरह से पेश करते थे। जब भी उन्होंने रियल लाइफ, किताबों या पत्रिकाओं में एक दिलचस्प केरेक्टर देखा, तो उन्होंने बाद में उस लुक को अपनी फिल्मों के लिए ध्यान में रखा। उन्होंने खुद को कई वास्तविक जीवन व्यक्तित्व जैसे कि शेख मुजीबुर रहमान, एडोल्फ हिटलर, सैम पित्रोदा और अब्राहम लिंकन जैसे अन्य लोगों के बीच में मॉडलिंग की।

कई फिल्मों ने उनकी परफॉर्मेंस ने पूरी फिल्म को ही एक अलग टच दिया। सबसे फेमस जिस देश में गंगा बहती हैं (1960) के दौरान प्राण ने ही राज कपूर को सुझाव दिया था कि उन्हें डकैत के डर के लिए अपनी गर्दन पर हाथ चलाना चाहिए और गले में रस्सी का फंदा भी होना चाहिए। इस तरह खूंखार डकैत राका का जन्म हुआ था।

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वर्ष 2001 में प्राण साहब को देश के तीसरे सर्वोच्च सम्मान ‘पद्म भूषण’ से नवाज़ा गया। साल 2013 में उन्हें ‘दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड फॉर लाइफटाइम अचीवमेंट’ से सम्मानित किया गया था। 12 जुलाई, 2013 को 93 वर्ष की उम्र में मुंबई के प्रसिद्ध लीलावती अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र में प्राण साहब ने आखिरी सांस ली और इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।

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