स्पेशल: सुनील दत्त को रेडियो जॉकी की नौकरी के दौरान मिला था फिल्मों में काम, बस में कंडक्टरी भी की

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Sunil-Dutt-Biography

एक साधारण व्यक्ति से अभिनेता, निर्देशक, निर्माता और राजनीति तक पहुंचे और अपने अभिनय से प्रशंसकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ने वाले अभिनेता सुनील दत्त की आज 6 जून को 93वीं जयंती है। वह असाधारण प्रतिभा के धनी थे, साथ ही समाज सेवक बनकर समाज के जरूरतमंदों की सेवा भी की।

बलराज दत्त था बचपन का नाम

अभिनेता सुनील दत्त का जन्म 6 जून, 1929 को झेलम जिले के खुर्द (अब पंजाब, पाकिस्तान में) नामक गांव में हुआ था। बहुत कम ही लोगों को पता है कि उनका बचपन का नाम बलराज दत्त था। सुनील दत्त का बचपन काफी संघर्षों में बीता। जब वह मात्र 5 साल के थे, तभी उनके पिता दीवान रघुनाथ दत्त का निधन हो गया था। उनकी परवरिश का दायित्व मां कुलवंती देवी पर आ गया।

जब वह 18 साल के थे, तब भारत-पाक विभाजन के दौरान पूरे देश में हिंदू-मुस्लिम हिंसा भड़क गई। उस समय उनके पिता के मुसलमान दोस्त याकूब ने उनके परिवार को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। उनका परिवार बाद में पंजाब के यमुनानगर में यमुना नदी के तट पर बसे एक छोटा सा गांव मंडौली में ​आकर बस गया, जो अब हरियाणा में स्थित है। बाद में वह अपनी मां कुलवंतदेवी दत्त के साथ लखनऊ चले गए और वहीं से स्नातक की पढ़ाई की। इसके बाद वह मुंबई चले गए, जहां उन्होंने स्नातक के लिए जय हिंद कॉलेज में दाखिला लिया। अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्होंने मुंबई बेस्ट की बसों में कंडक्टर की नौकरी कर ली। वहां से शुरू हुआ उनका सफ़र जिस मुकाम तक पहुंचा वो काफी प्रेरक है।

रेडियो जॉकी से शुरू किया कॅरियर

सुनील दत्त ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद एक एड एजेंसी में नौकरी करने लग गए, जहां से उन्हें रेडियो सीलोन में रेडियो जॉकी बनने का मौका मिला। उद्घोषक के रूप में काम करते हुए वह काफी मशहूर भी हुए। एक सफल उद्घोषक के रूप में अपनी पहचान बनाने के बाद सुनील कुछ नया करना चाहते थे और उनकी रूचि अभिनय करने में अधिक थी। उन्हें जल्द ही 1955 में बनी फिल्म ‘रेलवे स्‍टेशन’ में ब्रेक मिल गया। यह उनकी पहली फिल्म थी, जिसके दो साल बाद साल 1957 में आई ‘मदर इंडिया’ ने उन्हें बालीवुड का फिल्म स्टार बना दिया।

इस फिल्म के दौरान सुनील दत्त को नरगिस से प्यार हुआ और वर्ष 1958 को दोनों विवाह के बंधन में बंध गए।सुनील दत्त ने अपने 40 साल लंबे फिल्मी कॅरियर में 50 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें से 20 में विलेन का किरदार निभाया है। डकैतों के जीवन पर बनी उनकी सबसे बेहतरीन फिल्म ‘मुझे जीने दो’ ने उन्हें वर्ष 1964 का फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार भी दिलवाया।

वर्ष 1966 में उन्हें फिर से ‘खानदान’ फिल्म के लिए फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1950 के आखिरी वर्षों से लेकर 1960 के दशक में उन्होंने हिन्दी फिल्म जगत को कई बेहतरीन फिल्में दीं जिनमें साधना (1958), सुजाता (1959), मुझे जीने दो (1963), गुमराह (1963), वक़्त (1965), खानदान (1965), पड़ोसन (1967) और हमराज़ (1967) आदि प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं।

फ़िल्म निर्माण में अजमाया हाथ

सुनील दत्त ने वर्ष 1963 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘यह रास्ते है प्यार के’ के ज़रिए फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भी क़दम बढ़ाये। यह फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर ज़्यादा सफल नहीं रही। इस फ़िल्म के बाद सुनील दत्त ने फ़िल्म ‘मुझे जीने दो’ का निर्माण किया। यह फ़िल्म डाकुओं के जीवन पर आधारित थी। यह फ़िल्म सुपरहिट साबित हुई।सुनील दत्त ने वर्ष 1971 में अपनी महत्वकांक्षी फ़िल्म ‘रेशमा और शेरा’ का निर्माण और निर्देशन किया। इस फ़िल्म में उन्होंने भूमिका भी निभाई। यह एक पीरियड और बड़े बजट की फ़िल्म थी जिसे दर्शकों ने नकार दिया। निर्माता और निर्देशक बनने के बाद भी सुनील दत्त अभिनय से कभी ज़्यादा समय के लिए दूर नहीं रहे।

उन्होंने हीरा (1973), प्राण जाए पर वचन ना जाए (1974), नागिन (1976), जानी दुश्मन (1979), मुकबला (1979) और शान (1980) जैसी हिट फिल्मों में अभिनय किया। उन्होंने 1970 के दशक में पंजाबी धार्मिक फिल्मों की एक श्रृंखला में भी अभिनय किया, जिनमें ‘मन जीते जग जीते’ (1973), सुख भंजन तेरा नाम (1974), और सत श्री अकाल (1977) आदि प्रमुख हैं।

उन्होंने वर्ष 1981 की फिल्म रॉकी के साथ अपने बेटे संजय दत्त को लॉन्च किया, जो बॉक्स ऑफिस पर एक सुपरहिट फिल्म थी। हालांकि, फिल्म की रिलीज से कुछ ही समय पहले उनकी पत्नी नरगिस का कैंसर की बीमारी से निधन हो गया था। उन्होंने अपनी पत्नी नरगिस की याद में कैंसर पीड़ित रोगियों के इलाज के लिए नरगिस दत्त फाउंडेशन की स्थापना की। भारत सरकार ने 1968 में उन्हें पद्म श्री सम्मान प्रदान किया।

राजनीतिक सफर

वर्ष 1984 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। उसी वर्ष मुंबई उत्तर—पश्चिम से पहली बार लोकसभा में सांसद चुने गए। उन्होंने वर्ष 1989 और 1991 के आम चुनावों में अपनी लोकसभा सीट को सुरक्षित रखा। उन्होंने अपने बेटे संजय दत्त के खिलाफ मुक़दमे के कारण वर्ष 1996 और 1998 में लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा। वर्ष 1999, 2000 और 2004 के चुनावों में उन्होंने अपनी लोकसभा सीट को बरकरार रखा।सुनील दत्त को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार वर्ष 2004-09 में युवा मामलों और खेल मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया।

निधन

सुनील दत्त का 25 मई, 2005 को मुम्बई में पाली हिल बान्द्रा स्थित बंगले पर हृदय गति बन्द हो जाने से उनका देहांत हो गया।

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