शांति घोष: वह महिला क्रांतिकारी जिसने 15 साल की उम्र में ब्रिटिश मजिस्ट्रेट को गोली मारी

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान देने वाली शांति घोष की 22 नवंबर को 103वीं जयंती हैं। उन्होंने सुनीति चौधरी के साथ मिलकर भगत सिंह की फांसी का बदला लेने के लिए त्रिपुरा के कोमिल्ला के जिला मजिस्ट्रेट की हत्या कर दी थी। उस समय उनकी उम्र मात्र 15 वर्ष की थी। उन्हें सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लेने के लिए जाना जाता है।

जीवन परिचय

शांति घोष का जन्म 22 नवंबर, 1916 को कलकत्ता में हुआ था। वह देव, भारत में हुआ था। उनके पिता देबेंद्रनाथ घोष थे, जो मूलत: बारीसाल जिले के निवासी थे और कोमिला कॉलेज में प्रोफेसर थे। वह एक राष्ट्रवादी और दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर थे। उनके पिता के देश प्रेम ने शांति को काफी प्रभावित किया।

जब वह आगे की पढाई के कालेज में पंहुची, तो कॉलेज की अपनी एक सीनियर प्रफुल्लनलिनी ब्रह्मा के जरिये युगांतर पार्टी नामक क्रांतिकारियों के संगठन के संपर्क में आयीं और देश के आज़ादी के लिए कुछ करने का स्वप्न देखने लगीं। इसी दौरान हुए एक छात्र सम्मलेन ने शान्ति और उनकी जैसी अन्य युवा लड़कियों की देश के लिए की जाने वाली गतिविधियों को नयी ऊर्जा दी।

स्कूली शिक्षा के दौरान क्रांतिकारी संगठन से जुड़ी

जब शांति घोष फजुनिस्सा गर्ल्स स्कूल में पढ़ती थी, तब उसकी सहपाठी प्रफुल्ल नलिनी के संपर्क में आकर क्रांतिकारी संगठन ‘युगांतर’ में शामिल हो गई। उसे क्रांतिकारियों की तरह प्रशिक्षण दिया गया। युगांतर एक क्रांतिकारी संगठन था जो ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या कर ब्रिटिश राज में भय फैलाना चाहते थे, ताकि देश को आजाद करवाया जा सके।

सुनीति चौधरी के साथ चार्ल्स स्टीवंस को मारी गोली

जब वह क्रांतिकारी प्रशिक्षण में दक्ष हो गई थी तब 14 दिसंबर, 1931 को उन्हें सुनीति चौधरी के साथ एक बड़ी जिम्मेदारी दी गई। उस समय उनकी उम्र 15 साल और सुनीति की 14 साल थी, इन दोनों युवा क्रांतिकारियों के कंधों पर एक ब्रिटिश नौकरशाह और कोमिल्ला जिले के मजिस्ट्रेट चार्ल्स जेफ्री बकलैंड स्टीवंस को मौत के घाट उतराना था।

इस घटना के बाद उन दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर फरवरी, 1932 में कलकत्ता अदालत में मुकदमा चला और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। लेकिन वे इस सजा से निराश थी क्योंकि उसे फांसी की सजा नहीं दी गई थी और इस तरह वह भी देश के लिए अपनी शहादत नहीं दे पाई।

बाद में घोष को जेल में अपमान और शारीरिक शोषण का शिकार होना पड़ा और उसे “दूसरे दर्जे का कैदी” माना गया। वर्ष 1939 में उन्हें कई राजनीतिक कैदियों के साथ जेल से रिहा कर दिया गया।

निजी जीवन

जेल से रिहाई के बाद उन्होंने पुन: अपनी पढ़ाई बंगाली महिला कॉलेज में शुरू की। वह भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ी गई। बाद में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गईं।

वर्ष 1942 में शांति घोष ने चंटगांव के एक क्रांतिकारी और प्रोफेसर चितरंजन दास से शादी की। उन्होंने 1952–62 और 1967–68 तक पश्चिम बंगाल विधान परिषद में योगदान दिया। उन्हें वर्ष 1962-64 तक पश्चिम बंगाल विधानसभा की सदस्य बनी। घोष ने ‘अरुण बहनी’ नामक अपनी आत्मकथा लिखी और प्रकाशित की।

निधन

महान महिला क्रांतिकारी शांति घोष का 28 मार्च, 1989 को निधन हो गया।

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