टोंक : सबसे ब़ड़ी सियासी लड़ाई की गवाह बनेगी यह विधानसभा सीट

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राजस्थान विधानसभा चुनाव में अब वोटिंग होने में कुछ दिन ही बचे हैं। ऐसे में अब सीटों के अनुसार नेताओं की टक्कर का अंदाजा लगाया जाने लगा है। राजस्थान की टोंक विधानसभा सीट काफी गर्म मानी जा रही है क्योंकि यहां प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सचिन पायलट तो उनके सामने भाजपा में वसुंधरा राजे का एकदम खास यूनुस खान है।

मुकाबला और रोचक इसलिए हो जाता है कि जहां कांग्रेस ने 46 सालों तक यहां कोई अल्पसंख्यक उम्मीदवार नहीं उतारा तो 38 साल में पहली बार बीजेपी ने यहां कोई अल्पसंख्यक उम्मीदवार उतारा है।

चर्चा में आई नवाबों की नगरी टोंक

राजस्थान रियासतों का राज्य है, ऐसे में टोंक जिले को नवाबों की रियासत कहा जाता है। आमिर खान पिंडरी ने बनास नदी के दक्षिण में टोंक को बसाया था। टोंक विधानसभा सीट से दो दिग्गज आमने सामने आने के बाद एक बार फिर टोंक लोगों की जुबां पर छाया हुआ है।

क्या है यहां के सियासी समीकरण

टोंक सीट से कांग्रेस 1972 से लेकर 2013 तक हमेशा ही मुस्लिम उम्मीदवार उतारती आई है। वहीं 1980 से लेकर 2013 तक भाजपा ने यहां केवल हिंदू उम्मीदवार उतारा है। इसलिए इस सीट को हमेशा से ही हिंदू और मुसलमान के सियासी चश्मे से देखा जाता है। टोंक में सचिन पायलट की जाति से आने वाले गुर्जर समुदाय के करीब 45 हजार मतदाता है तो 70 हजार मुस्लिम हैं। इसके अलावा टोंक सीट पर 80 हजार के करीब एससी-एसटी के वोट हैं।

इससे लगता है कि अगर गणित बिठाया जाए तो अल्पसंख्यक, एससी-एसटी और गुर्जर पायलट को वोट करें तो उनकी जीत आसान है।

यूनुस खान तुरुप का इक्का या बलि का बकरा?

बीजेपी ने लंबी चली घालमेल के बाद आखिरकार बीजेपी से अल्पसंख्यक चेहरे के रूप में यूनुस खान को टिकट दिया जिसका यकीन ना किसी टोंकवासी को हुआ और ना खुद यूनुस खान को। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आएसएस) यूनुस को इस बार कहीं से भी टिकट देने के मूड में नहीं था और राजे के खास रहने के कारण वो हर हाल में उनको टिकट दिलवाना चाहती थी।

आखिरकार वसुंधरा राजे को जीत मिली और संघ ने अपनी हार मानी और राजे यूनुस खान को उनके पसंदीदा क्षेत्र से ना सही पर टोंक से टिकट दिलवाने में कामयाब हुई।

इन सब के बीच खुद टोंक क्या चाहता है?

राजस्थान के टोंक जिले में काफी पिछड़ापन है और सुविधाओं का यहां काफी अभाव है। काफी समय से लोग यहां से रेलवे स्टेशन और रेल लाइन बिछाने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा यहां किसानों को बीसलपुर डैम होने के बाद भी पानी की समस्या, फसलों की सही कीमत ना मिलना जैसी समस्याएं भी रहती है।

यहां बसने वाली 80 फीसदी आबादी जो किसानी पर निर्भर रहती है उसको इस बार युवा चेहरे पायलट से उम्मीदें हैं

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