रासबिहारी बोस: जापान में रहकर भारत की आजादी के लिए लड़े

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जिस तत्परता के साथ देश को आजादी दिलाने की ताउम्र कोशिश करने वालों में रासबिहारी बोस अन्य क्रांतिकारियों से बिल्कुल अलग थे। 21 जनवरी को रास बिहारी बोस की 75वीं पुण्यतिथि हैं। उन्होंने देश को अंग्रेजी हुकूमत से आजाद करवाने के लिए गदर आंदोलन की योजना बनाई, तो जापान में रहकर इंडिपेंडेंस लीग और बाद में आजाद हिंद फौज का गठन कर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। हालांकि उनके द्वारा देश के लिए किये गए इस संघर्ष को परिणाम तक पहुंचाने से पहले ही इस महान क्रांतिकारी का स्वर्गवास हो गया था।

जीवन परिचय

क्रांतिकारी रासबिहारी बोस का जन्म 25 मई, 1886 को बंगाल के बर्धमान जिले के सुबालदह नामक गांव में हुआ था। बाल्यकाल में ही उनकी माता का देहांत हो जाने से उनका लालन—पालन उनकी मामी ने किया। उनके पिता विनोद बिहारी बोस थे, जो चन्द्रनगर में पढ़ाने का कार्य करते थे, उसी स्कूल में रासबिहारी की प्रारंभिक शिक्षा संपन्न हुई थी।

चंद्रनगर पर उस समय फ्रांसीसियों के कब्जे में था। यहीं से रासबिहारी ने आगे की शिक्षा के लिए डुप्लेक्स कॉलेज में दाखिला लिया। उन पर अध्यापक चारू चांद के क्रांतिकारी विचारों का प्रभाव पड़ा। उन्होंने बाद में चिकित्सा शास्त्र और इंजीनियरिंग की पढ़ाई फ्रांस और जर्मनी से की।

वह बाल्यकाल से ही देश की आजादी के बारे में सोचते थे और क्रान्तिकारी गतिविधियों में गहरी दिलचस्पी लेते थे। उन्होंने देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में कुछ समय तक हेड क्लर्क के रूप में कार्य किया था।

रासबिहारी बोस का क्रांतिकारी जीवन

सन् 1905 में जब बंगाल विभाजन का विरोध पूरे देश में जारी था, तब पहली बार रासबिहारी बोस क्रांतिकारी गतिविधियों में सलग्न हुए। इस आंदोलन के दौरान उन्होंने अरविंद घोष और जतिन मुखर्जी के साथ मिलकर बंगाल विभाजन के पीछे अंग्रेजी हुकूमत की सोच को देशवासियों के सामने उजागर करने का प्रयत्न किया। उनका परिचय धीरे-धीरे बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारियों जैसे जतिन मुखर्जी की अगुआई वाले ‘युगान्तर’ क्रान्तिकारी संगठन के अमरेन्द्र चटर्जी और अरविद घोष के राजनीतिक शिष्य रहे जतीन्द्रनाथ बनर्जी उर्फ निरालम्ब स्वामी से हुआ।

उनके नेतृत्व में वायसरा लॉर्ड हार्डिंग पर बम से जानलेवा हमला करने की योजना बनाई। 23 दिसंबर 1911 में ‘दिल्ली दरबार’ के बाद जब भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग की सवारी दिल्ली के चांदनी चौक में निकाल रही थी, उसी दौरान हार्डिंग पर बम फेंका गया, परंतु बम फेंकने वाले बसंत कुमार विश्वास निशाना चुक गये और बम हार्डिंग की बग्गी पर न गिरकर दूर जा गिरा। इस बम काण्ड में हार्डिंग बाल-बाल बच गए। बसंत को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन रासबिहारी पुलिस से बचकर निकल भागे। इस बम कांड में राजस्थान के दो क्रांतिकारी प्रताप सिंह बारहठ भी सम्मिलित थे।

अंग्रेजी प्रशासन को उन पर कोई शक न हो इसलिए उन्होंने देहरादून के नागरिकों की एक सभा बुलायी और वायसराय हार्डिंग पर हुए हमले की निन्दा भी की।

गदर आंदोलन

उन्होंने भारत को आजादी दिलाने के लिये प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गदर पार्टी के सरदार करतार सिंह सराभा के साथ मिलकर गदर आंदोलन के माध्यम से 1857 की तरह क्रांतिक की योजना बनायी और 21 फरवरी, 1915 के दिन एक साथ पूरे देश में इसे शुरू करना था। इस योजना के बारे में अंग्रेजों को पता चलने पर क्रांतिकारियों के दो दिन पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया और योजना असफल हो गई। उनके क्रांतिकारी कार्यों का एक प्रमुख केंद्र वाराणसी रहा, जहाँ से उन्होंने गुप्त रूप से क्रांतिकारी आंदोलनों का संचालन किया।

जापान में रहकर देश की आजादी के लिए लड़े

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान युगांतर के कई नेताओं ने ‘सशस्त्र गदर क्रांति’ की योजना बनाई, जिसमें रासबिहारी बोस की प्रमुख भूमिका थी। इस योजना के असफल होने पर के बाद ब्रिटिश पुलिस रासबिहारी बोस के पीछे लग गयी, जिसके कारण उन्हें भागकर जून 1915 में राजा पी. एन. टैगोर के छद्म नाम से जापान जाना पड़ा और वहीं से देश की आजादी के लिए ताउम्र संघर्ष करते रहे।

जापान में उन्होंने अपने जापानी क्रान्तिकारी मित्रों के साथ मिलकर देश की स्वतन्त्रता के लिये निरन्तर प्रयास किया। जापान में उन्होंने अंग्रेजी अध्यापन, लेखन और पत्रकारिता का कार्य किया। वहाँ पर उन्होंने ‘न्यू एशिया’ नाम से एक समाचार-पत्र भी निकाला। उन्होंने जापानी भाषा भी सीख ली और इस भाषा में कुल 16 पुस्तकें लिखीं। उन्होंने हिन्दू धर्मग्रन्थ ‘रामायण’ का भी अनुवाद जापानी भाषा में किया।

रासबिहारी बोस ने जापान में ही वर्ष 1916 में विवाह कर लिया और सन् 1923 में जापानी नागरिकता प्राप्त कर ली। यही रहकर रासबिहारी बोस ने जापानी अधिकारियों को भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन और राष्ट्रवादियों के पक्ष में खड़ा करने और भारत की आजादी की लड़ाई में उनका सक्रिय समर्थन दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

‘इंडियन इंडीपेंडेंस लीग’ की स्थापना

उनके प्रयासों से टोक्यो में ‘इंडियन इंडीपेंडेंस लीग’ की स्थापना मार्च 1942 में की गई और भारत की आजादी दिलाने के लिए एक सेना गठित करने का प्रस्ताव भी पेश किया।

जून 1942 में उन्होंने बैंकाक में इंडियन इंडीपेंडेंस लीग का दूसरा सम्मेलन बुलाया, जिसमें सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने और उसका अध्यक्ष बनने के लिए आमन्त्रित किया गया।

मलय और बर्मा के मोर्चे पर जापान ने कई भारतीय युद्धबन्दियों को पकड़ा था। इन युद्धबन्दियों को इंडियन इंडीपेंडेंस लीग में शामिल होने और आजाद हिन्द फौज (आई०एन०ए०) का सैनिक बनने के लिये प्रोत्साहित किया गया। आई०एन०ए० इण्डियन नेशनल लीग की सैन्य शाखा के रूप में सितम्बर 1942 में गठित की गयी। इसके बाद जापानी सैन्य कमान ने रास बिहारी बोस और जनरल मोहन सिंह को आई०एन०ए० के नेतृत्व से हटा दिया लेकिन आई०एन०ए० का संगठनात्मक ढाँचा बना रहा। बाद में सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के नाम से आई०एन०ए० का पुनर्गठन किया।

निधन

भारत को ब्रिटिश हुकूमत से आजादी दिलाने का सपना लिए भारत माता का यह वीर सपूत 21 जनवरी, 1945 को परलोक सिधार गया। उनके कार्यों के लिए जापानी सरकार ने उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन’ के सम्मान से सम्मानित किया था।

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