रानी गाइदिन्ल्यू को कहा जाता है नागालैण्ड की रानी लक्ष्मीबाई, जानें क्यों

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Rani Gaidinlu

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की एक प्रसिद्ध महिला क्रांतिकारी रानी गाइदिन्ल्यू की 17 फरवरी को 27वीं डेथ एनिवर्सरी हैं। उन्होंने आजादी के दौरान नागालैण्ड में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया। उन्होंने मात्र 13 साल की उम्र में अपने चचेरे भाई जादोनांग के ‘हेराका’ आंदोलन में में भाग लिया। वह 16 साल की उम्र में गिरफ्तार की गई। उन्हें ‘रानी’ की उपाधि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने दी थी। भारत सरकार ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी और पद्म भूषण से सम्मानित किया।

जीवन परिचय

रानी गाइदिन्ल्यू का जन्म 26 जनवरी, 1915 को मणिपुर के तमेंगलोंग जिले के तौसेम उप-खंड के नुन्ग्काओ (लोंग्काओ) गांव में हुआ था। वह आठ भाई—बहनों में पांचवें नबरं की थी। उनके औपचारिक शिक्षा नहीं हो सकी थी, क्योंकि वहां कोई स्कूल नहीं था।

‘हेराका’ आंदोलन में हुई शामिल

जब वह 13 साल की थी तब उन्होंने अपने चचेरे भाई जादोनांग के ‘हेराका आन्दोलन’ में भाग लिया में शामिल हो गई थीं। जादोनांग देश की आजादी के समय एक स्थानीय नेता थे। उनके आंदोलन का लक्ष्य प्राचीन नागा धार्मिक मान्यताओं की बहाली और पुनर्जीवन। लेकिन यह आंदोलन बाद में अंग्रेजी विरोधी बन गया। धीरे-धीरे कई कबीलों के लोग इस आन्दोलन में शामिल हो गए और इसने गदर का स्वरुप धारण कर लिया।

उनकी इस विचारधारा और सिद्धान्तों का प्रभाव गाइदिन्ल्यू पर पड़ा और वह भी उसकी सेना में शामिल हो गई। उसने भी अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध छापामार लड़ाई लड़ी। वर्ष 1931 में जब अंग्रेजों ने जादोनांग को गिरफ्तार कर फांसी पर चढ़ा दिया, तब रानी गाइदिन्ल्यू उसकी आध्यात्मिक और राजनीतिक उत्तराधिकारी बन गई।

ब्रिटिश सरकार के खिलाफ खुलकर किया विद्रोह

रानी ने अपने समर्थकों के साथ अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध खुलकर विद्रोह किया। उन्होंने लोगों से कहा कि वे सरकार को कर नहीं दें। कुछ स्थानीय नागा लोगों ने खुलकर उनके कार्यों के लिए चंदा दिया। ब्रिटिश सरकार उनकी गतिविधियों से सतर्क हो गई। बाद में रानी को गिरफ्तार करने के लिए असम के गवर्नर ने ‘असम राइफल्स’ की दो टुकड़ियां भेजी। इसके साथ-साथ प्रशासन ने रानी गाइदिनल्यू को पकड़ने में मदद करने के लिए इनाम भी घोषित कर दिया। बाद में 17 अक्टूबर, 1932 को रानी और उनके कई समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया गया।

नेहरू ने दी ‘रानी’ की उपाधि

उन्हें इंफाल ले जाया गया। उन पर मुकदमा चला और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। साथ ही उनके समर्थकों को जेल में डाल दिया गया और कुछ को मौत की सजा दी गइ। वर्ष 1933 से लेकर वर्ष 1947 तक रानी गाइदिन्ल्यू को गुवाहटी, शिलांग, आइजोल और तुरा जेल में स्थानांतरित किया गया। वर्ष 1937 में जवाहर लाल नेहरु उनसे मिलने के लिए शिलांग जेल में मिले और उनकी रिहाई की मांग की। उन्होंने ही गाइदिन्ल्यू को ‘रानी’ की उपाधि दी। नेहरू ने ब्रिटिश सांसद लेडी एस्टर को इस सम्बन्ध में पत्र भी लिखा पर ‘सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फॉर इंडिया’’ ने इस निवेदन को अस्वीकृत कर दिया।

देश की आजादी और रानी गाइदिन्ल्यू की रिहाई

वर्ष 1946 जब देश में अंतरिम सरकार का गठन हुआ, तो उसके प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। उनके निर्देश पर रानी गाइदिन्ल्यू को तुरा जेल से रिहा कर दिया गया। इसके बाद वह अपने क्षेत्र के लोगों के जीवन स्तर के उत्थान और विकास में कार्य करती रहीं।

रानी ने नागा नेशनल कौंसिल (एन.एन.सी.) का विरोध किया था क्योंकि वह नागालैंड को भारत से अलग करने चाहते थे। रानी ज़ेलिआन्ग्रोन्ग समुदाय के लिए भारत के अन्दर ही एक अलग क्षेत्र चाहती थीं। एन.एन.सी. उनका इस बात के लिए भी विरोध कर रहे थे, क्योंकि वह परंपरागत नागा धर्म और रीति-रिवाजों को पुनर्जीवित करने का प्रयास भी कर रही थीं। नागा कबीलों की आपसी स्पर्धा के कारण रानी को अपने सहयोगियों के साथ 1960 में भूमिगत हो जाना पड़ा और भारत सरकार के साथ एक समझौते के बाद वह 6 साल बाद 1966 में बाहर आयीं।

फरवरी, 1966 में वे दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री से मिलीं और एक पृथक ज़ेलिआन्ग्रोन्ग प्रशासनिक इकाई की मांग की। इसके बाद उनके समर्थकों ने आत्म-समर्पण कर दिया जिनमें से कुछ को नागालैंड आर्म्ड पुलिस में भर्ती कर लिया गया।

पुरस्कार और सम्मान

उन्हें वर्ष 1972 में ‘ताम्रपत्र स्वतंत्रता सेनानी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। रानी को वर्ष 1982 में भारत के तीसरे सर्वोच्च सम्मान पद्म भूषण और वर्ष 1983 में ‘विवेकानंद सेवा पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।

निधन

रानी वर्ष 1991 में अपनी मातृभूमि लोंग्काओ लौट आईं थी और यहीं पर 78 साल की उम्र में 17 फरवरी, 1993 को निधन हो गया।

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