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रामप्रसाद बिस्मिल क्रांतिकारी के साथ लेखक, शायर और साहित्यकार भी थे

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भारत की आजादी में अपना योगदान देने वाले क्रांतिकारी, शायर, लेखक, साहित्यकार रामप्रसाद बिस्मिल की आज 122वीं जयंती है। बिस्मिल ने देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। बिस्मिल को 30 वर्ष की आयु में ब्रिटिश सरकार ने अशफाक उल्ला खां और रोशन सिंह के साथ फांसी दी। वह मैनपुरी षड्यन्त्र व काकोरी-काण्ड जैसी कई घटनाओं में शामिल थे तथा हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के सदस्य भी थे।

जीवन परिचय

भारत के क्रान्तिकारी और प्रसिद्ध लेखक रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून, 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर गांव में हुआ था। इनके पिता मुरलीधर, जो कचहरी में सरकारी स्टाम्प बेचने का कार्य करते ​थे। इनकी माता मूलमति गृहणी थी। छह वर्ष की आयु में बिस्मिल को स्कूल पढ़ने के लिए भेजा गया। इनके पिता शिक्षा के महत्व को समझते थे इसलिए इनकी पढ़ाई पर विशेष ध्यान दिया गया।

बिस्मिल ने 14 वर्ष की आयु में चौथी कक्षा पास की। उन्हें उर्दू, हिन्दी और अंग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान था, परंतु गलत संगति के कारण वह आठवीं कक्षा से आगे की पढ़ाई नहीं कर सके।

आर्य समाज ने बदला जीवन का उद्देश्य

रामप्रसाद पर स्वामी दयानंद जी की शिक्षाओं का इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि वह आर्य समाज के सिद्धान्तों का पूरी तरह से अनुसरण करने लगे और आर्य समाज के कट्टर अनुयायी बन गये। बिस्मिल का परिवार सनातन धर्म को मानता था और इनके पिता कट्टर सनातन धर्मी थे। ​इस बात को लेकर पिता-पुत्र में कलह हो गया और वह कुछ दिनों के लिए घर छोड़कर चले गये।

जब रामप्रसाद बिस्मिल 18 वर्ष के थे, भारत की स्वतंत्रता के लिए क्रांतिकारी सेनानी भाई परमानन्द को ब्रिटिश सरकार ने ‘ग़दर षड्यंत्र’ में शामिल होने के लिए फांसी की सजा सुनाई, तो इसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा।

वर्ष 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में नरम दल के विरोध के बावजूद लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की शोभायात्रा निकाली। इसके बाद उन्होंने कुछ साथियों की मदद से ‘अमेरिका की स्वतंत्रता का इतिहास’ नामक एक पुस्तक प्रकाशित करवाई, जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया।

मैनपुरी षड्यन्त्र

रामप्रसाद बिस्मिल ने ब्रिटिश सत्ता से देश को आजाद कराने के लिए ‘मातृदेवी’ नामक एक क्रान्तिकारी संगठन की स्थापना की। उनकी मदद पंडित गेंदा लाल दीक्षित जी ने की, जिन्होंने बाद में ‘शिवाजी समिति’ नाम की एक क्रान्तिकारी संगठन की स्थापना की थी। दोनों संगठनों ने मिलकर इटावा, मैनपुरी, आगरा और शाहजहांपुर जिलों के युवकों को देश सेवा के लिए संगठित किया।

जनवरी 1918 में बिस्मिल ने ‘देशवासियों के नाम सन्देश’ नाम का एक पैम्फलेट प्रकाशित किया और अपनी कविता ‘मैनपुरी की प्रतिज्ञा’ के साथ-साथ इसका भी वितरण करने लगे। वर्ष 1918 में उन्होंने अपने संगठन को मजबूत करने और ब्रिटिश सरकार में भारतीयों का खौफ उत्पन्न करने के लिए डकैती भी डाली।

1918 में कांग्रेस के दिल्ली अधिवेसन के दौरान पुलिस ने उनको और उनके संगठन के दूसरे सदस्यों को प्रतिबंधित साहित्य बेचने के लिए छापा डाला पर बिस्मिल भागने में सफल रहे। पुलिस से मुठभेड़ के बाद उन्होंने यमुना में छलांग लगा दी और तैर कर आधुनिक ग्रेटर नोएडा के बीहड़ जंगलों में चले गए।

उधर ‘मैनपुरी षड्यंत्र’ मुकदमे में ब्रिटिश जज ने फैसला सुनते हुए बिस्मिल और दीक्षित को भगोड़ा घोषित कर दिया।

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना

वर्ष 1922 में गाँधी द्वारा असहयोग आन्दोलन को वापस लेने से कई क्रांतिकारी नाराज हो गए, जिसके परिणामस्वरूप बिस्मिल ने अपने नेतृत्व में संयुक्त प्रान्त के युवाओं को संगठित करके क्रान्तिकारी दल का निर्माण किया। गदर पार्टी के संस्थापक लाला हरदयाल की सहमति से वर्ष 1923 में पार्टी के संविधान को बनाने के लिये वह इलाहबाद गये। पार्टी की स्थापना और उद्देश्यों के निर्माण में बिस्मिल के साथ-साथ शचीन्द्र नाथ सान्याल, जय गोपाल मुखर्जी आदि शामिल थे।

इस संगठन की पहली बैठक का आयोजन 3 अक्टूबर, 1923 को कानपुर में किया गया। इस सभा में बंगाल प्रान्त के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल को पार्टी का अध्यक्ष चुना गया। बिस्मिल को शाहजहांपुर जिले के नेतृत्व के साथ ही शस्त्र विभाग का प्रमुख नियुक्त किया गया। सभा में समिति ने सबकी सहमति से पार्टी के नाम को बदल कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोशिएशन (एचआरए) रख दिया। पार्टी के लिए फण्ड एकत्र करने के लिए 25 दिसम्बर, 1924 को बमरौली में डकैती डाली गयी।

काकोरी कांड

संगठन के लिए धन की कमी को पूरा करने के लिए बिस्मिल ने सरकारी खजाना लूटने की योजना बनायीं और उनके नेतृत्व में कुल 10 लोगों ने लखनऊ के पास काकोरी स्टेशन के निकट रेल रोककर 9 अगस्त, 1925 को सरकारी खजाना लूट लिया। 26 सितम्बर, 1925 को बिस्मिल के साथ-साथ 40 से भी अधिक लोगों को ‘काकोरी डकैती’ मामले में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें इस कार्य के लिए फांसी की सजा सुनाया गया।

सरफरोशी की तमन्‍ना

काकोरी कांड में गिरफ्तार होने के बाद जब अदालत में सुनवाई चल रही थी, उस दौरान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल ने
‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है?’ की कुछ पंक्तियां कही थीं।

बिस्मिल कविताओं और शायरी लिखने के काफी शौकीन थे। फांसी के फंदे को गले में डालने से पहले भी बिस्मिल ने ‘सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ के कुछ शेर पढ़े। वैसे तो ये शेर पटना के अजीमाबाद के मशहूर शायर बिस्मिल अजीमाबादी की रचना थी। लेकिन इसकी पहचान राम प्रसाद बिस्मिल को लेकर ज्‍यादा बन गई।

फांसी की सजा

रामप्रसाद बिस्मिल को अशफाक उल्ला खाँ, राजेन्द्र लाहिड़ी और रोशन सिंह के साथ मौत की सजा सुनाई गयी। उन्हें 19 दिसम्बर, 1927 को गोरखपुर जेल में फांसी दे दी गयी।

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