हिंदी में नागार्जुन और मैथिली भाषा में यात्री उपनाम से कविताएं लिखते थे कवि नागार्जुन

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हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि नागार्जुन की 5 नवंबर को 21वीं डेथ एनिवर्सरी हैं। वह एक हिंदी और मैथिली कवि थे, उन्होंने कई उपन्यास, लघु कथाएं, साहित्यिक आत्मकथाएं और यात्रा-वृतांत भी लिखे हैं। उन्हें जनकवि के नाम से जाना जाता है— द पीपल्स पोएट। उन्हें आधुनिक मैथिली का प्रसिद्ध कवि माना जाता है। यही वजह है कि उन्होंने हिंदी में ‘नागार्जुन’ और मैथिली में ‘यात्री’ उपनाम से कविताएं की।

जीवन परिचय

नागार्जुन का जन्म 30 जून, 1911 को मधुबनी के सतलखा गांव में हुआ, जबकि उनका पैतृक गांव बिहार के दरभंगा जिले के तरौनी था। उनके पिता का नाम गोकुल मिश्र और माता उमा देवी था। उनसे पहले गोकुल के चार संतानें हुई जिनकी पैदा होने के साथ ही मृत्यु हो गई थी। नागार्जुन उनकी पांचवीं संतान थी। उनके लिए उनके पिता ने भगवान शंकर की उपासना की। इसके बाद नागार्जुन का जन्म हुआ था और उनका नाम वैद्यनाथ रखा गया। उनका ज्यादा वक्त अपने ननिहाल सतलखा में बिता था। वह तीन साल के थे तब उनकी मां का देहांत हो गया।

बनारस से प्राप्त की शिक्षा

वैद्यनाथ की प्रारंभिक शिक्षा मिथिलांचल में हुई। यहां के धनी लोग यहां के गरीब मेधावी छात्रों की शिक्षा के लिए आर्थिक सहयोग देते थे। बाद में वह संस्कृत की पढ़ाने के लिए बनारस गए। यहीं पर वह आर्य समाज से प्रभावित हुए और फिर बौद्ध दर्शन की ओर झुकाव किया। बाद में वह बौद्ध बन गए। उन्होंने अपना नाम नागार्जुन रख लिया। उन्हें बौद्ध के रूप में राहुल सांकृत्यायन का अग्रज माना जाता है। उन्होंने संस्कृत, पाली और प्राकृत भाषाएं सीखी। इस दौरान उन्होंने अपराजिता देवी से शादी कर ली। उनके छह बच्चे हैं।

साहित्यिक जीवन और कॅरियर

नागार्जुन ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत 1930 के दशक में ‘यात्री’ उपनाम से मैथिली भाषा में कविताओं के साथ की। 1930 के दशक के मध्य तक, उन्होंने हिंदी में कविता लिखना शुरू कर दिया। उन्होंने एक शिक्षक के रूप में सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) में अध्यापन करवाया। लेकिन वह यहां लंबे समय तक नहीं रहे और वह श्रीलंका के केलानिया में बौद्ध मठ चले गए। यहां पर वह वर्ष 1935 में बौद्ध भिक्षु बन गए। वहां के मठ में प्रवेश लिया और शास्त्रों का अध्ययन किया। उन्होंने अपना नाम “नागार्जुन” रख लिया।

उन्होंने साहित्यिक रचनाओं के साथ देश की आजादी के दौरान हुए आंदोलनों में भाग लिया था। आजादी के बाद भी उन्होंने कई जन-जागरण आंदोलनों में भी भाग लिया। वह किसान नेता स्वामी सहजानंद से काफी प्रभावित थे। वर्ष 1939 और 1942 के बीच उन्होंने बिहार में किसान आंदोलन का नेतृत्व किया तो उन्हें जेल में डाल दिया गया था। आजादी के बाद लंबे समय तक वह पत्रकारिता से जुड़े रहे।

वर्ष 1974 में हुए जेपी आंदोलन में भी उन्होंने भाग लिया। इसमें भाग लेते हुए उन्होंने कहा था कि सत्ता की दुर्नीतियों के विरोध में एक जनयुद्ध चल रहा है, जिसमें मेरी हिस्सेदारी सिर्फ वाणी की ही नहीं, कर्म की हो, इसीलिए मैं आज अनशन पर हूं, कल जेल भी जा सकता हूँ। इस आंदोलन के सिलसिले में आपातकाल से पूर्व ही इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और फिर काफी समय जेल में रहना पड़ा।

उनकी प्रमुख रचनाएं

उपन्यास — रतिनाथ की चाची, बाबा बटेश्वरनाथ, दु:ख मोचन, बलचनमा, वरूण के बेटे, उग्रतारा, पारो, नई पौध, कुंभीपाक और आसमान में चांद तारे आदि।

कविता संग्रह — युगधारा, सतरंगे पंखो वाली, प्यासी पथराई आंखें, तालाब की मछलियां, चन्दना, खिचड़ी विप्लव देखा हमने, तुमने कहा था, पुरानी जूतियों का कोरस, हजार-हजार बांहोंवाली, पका है यह कटहल, अपने खेत में, मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा।

खंडकाव्य — भस्मांकुर, भूमिजा
अन्य — एक संस्कृत काव्य “धर्मलोक शतकम्” तथा संस्कृत से कुछ अनूदित कृतियों के रचयिता

पुरस्कार और सम्मान

नागार्जुन द्वारा मैथिली भाषा में लिखित उनके काव्य संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए वर्ष 1965 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें साहित्य अकादमी ने 1994 में साहित्य अकादमी फेलो के रूप में नामांकित कर सम्मानित भी किया था।

निधन

नागार्जुन को दमा की बीमारी थी, जिसके कारण उनका 5 नवंबर, 1998 को निधन हो गया।

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