नरगिस दत्त: फिल्म अभिनेत्री से समाज सेवा तक का सफर

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भारतीय हिन्दी सिनेमा की खूबसूरत और अपने जमाने की मशहूर अदाकारा नरगिस दत्त का आज 1 जून को 90वां जन्मदिन मनाया जा रहा है। उन्होंने बॉलीवुड में ‘मदर इंडिया’, ‘श्री 420’, ‘आवारा’ जैसी कई सुपरहिट फिल्मों में अपने अभिनय से दर्शकों के दिलों में अमिट छाप छोड़ी। उनकी फिल्म ‘मदर इंडिया’ को ऑस्कर के लिए नामित किया गया। उन्हें शानदार अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले।

फातिमा था असल नाम

नरगिस का असल नाम फातिमा रशीद था। उनका जन्म 1 जून, 1929 को कोलकाता में हुआ था। उनके पिता अब्दुल रशीद, जो पहले एक ब्राह्मण थे। उनका मूल नाम मोहनचंद उत्तमचंद था और वह मूल रूप से पंजाब प्रांत के रावलपिंडी के धनी व्यक्ति थे। बाद में उन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया। उनकी माता जद्दनबाई थीं, जो एक हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायिका थीं और भारतीय सिनेमा से जड़ी हुई थीं।

यूं मिला उन्हें प्यार

‘मदर इंडिया’ फिल्म की शूटिंग के दौरान सेट पर लगी आग में फंसी नरगिस की अभिनेता सुनील दत्त ने अपनी जान पर खेल कर जान बचाई थी। इसके बाद दोनों के बीच प्यार परवान पर चढ़ा और 11 मार्च 1958 को दोनों विवाह के बंधन में बंध गये। विवाह के बाद से ही नरगिस ने बॉलीवुड को अलविदा कह दिया और अपने परिवार को संभालने में लग गई। उनके तीन बच्चे हैं, जिनमें एक बेटा संजय और दो बेटियां नम्रता और प्रिया हैं।

संजय दत्त बॉलीवुड में एक सफल अभिनेता हैं। नम्रता ने बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता राजेंद्र कुमार के बेटे कुमार गौरव से शादी की। प्रिया दत्त एक राजनेता और 14वीं लोकसभा में संसद सदस्य बनीं।

6 साल की उम्र से ही शुरू हो गया था सफर 

नरगिस ने करीब 6 वर्ष की उम्र में ‘तलाश—ए-हक’ (1935) नामक फिल्म में बाल कलाकार की भूमिका निभाई। इसी फिल्म में उनका नाम बेबी नरगिस पड़ा था। उनका बॉलीवुड में वास्तविक कॅरियर चौदह वर्ष की उम्र में निर्देशक महबूब खान की फिल्म ‘तकदीर’ से शुरू हुआ।

उन्होंने 1940 और 1950 के दशक में कई बॉलीवुड फिल्मों के शानदार अभिनय किया, जैसे ‘बरसात’ (1949), ‘अंदाज़’ (1949), ‘जोगन’ (1950), ‘आवारा’ (1951), ‘दीदार’ (1951), ‘अंजाने’ (1952), ‘श्री 420’ (1955) और ‘चोरी चोरी’ (1956) उनकी प्रमुख फिल्में थी।

नरगिस ने विवाह के बाद से फिल्मों से दूरी बना ली, जिसके कारण 60 के दशक में वह फिल्मों में कभी कभार ही नजर आई। इस दौरान उनकी कुछ फिल्मों में एक थी ‘रात और दिन’ (1967), जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला।

नरगिस बॉलीवुड सिनेमा की पहली अभिनेत्री थी, जिन्हें पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया। सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री की श्रेणी में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने वाली अभिनेत्रियों में भी वह पहली अभिनेत्री थी। मुंबई में बांद्रा में उनके नाम पर सड़क है। प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में राष्ट्रीय एकता पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म को नरगिस दत्त पुरस्कार दिया जाता है।

फिल्मों के बाद समाज सेवा में हुई सक्रिय

नरगिस ने हिन्दी सिनेमा से दूरी बनने के बाद वह समाज सेवा में सक्रिय हुई। उन्होंने नेत्रहीन और विशेष बच्चों के लिए काम किया था। वह द स्पास्टिक्स सोसाइटी ऑफ इंडिया की पहली संरक्षक बनीं। उन्होंने अजंता कला सांस्कृतिक दल बनाया जिसमें तब के नामी कलाकार-गायक सरहदों पर जा कर तैनात सैनिकों का हौसला बढ़ाते थे, उनका मनोरंजन करते थे। बांग्लादेश बनने के बाद 1971 में उनका दल पहला था जिसने वहां कार्य किया था। उनको वर्ष 1981—82 में राज्यसभा के लिए नामित किया गया, लेकिन कैंसर होने के कारण उनकी कार्यकाल के दौरान मृत्यु हो गई।

कैंसर ने ली जान

भारतीय हिन्दी सिनेमा में अपने अभिनय से दर्शकों के दिलों में जगह बनाने वाली इस अदाकार का 3 मई, 1981 को 51 वर्ष की उम्र में पेंक्रियाटिक कैंसर होने से देहांत हो गया। वर्ष 1982 में उनकी याद में नरगिस दत्त मेमोरियल कैंसर फाउंडेशन की स्थापना की गई।

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