ओशो: वो विवादित गुरु जिसके क्रांतिकारी विचारों ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया

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OSHO

आधुनिक समय के सबसे प्रभावशाली और विवादित गुरुओं में से एक ओशो का जन्म 11 दिसंबर, 1931 को मध्य प्रदेश के रायसेन में हुआ था। उनका 19 जनवरी, 1990 को पुणे में 58 साल की उम्र में निधन हो गया था। ओशो का बचपन का नाम चंद्र मोहन जैन था, बाद में वे आचार्य रजनीश और फिर आगे चलकर ‘ओशो’ के नाम से मशहूर हुए। उनके आधुनिक और क्रांतिकारी विचार ही शायद उनको आज भी याद करने की एक वजह है। 19 जनवरी को ओशो की 30वीं पुण्यतिथि है, इस मौके पर जानते हैं उनके बारे में कुछ ख़ास बातें..

ओशो के दुनियाभर में हैं लाखों फॉलोअर्स

रायसेन जिले के कुचवाड़ा में जन्मे चंद्र मोहन यानि ओशो ने डीएन जैन कॉलेज से साल 1955 में फिलोसोफी में स्नातक डिग्री पूरी की। इसके बाद उन्होंने वर्ष 1957 में सागर यूनिवर्सिटी से अच्छे अंकों के साथ फिलोसोफी में मास्टर्स डिग्री प्राप्त की। इसके तुरंत बाद ही उन्हें रायपुर संस्कृत कॉलेज में ​टीचिंग शुरु कर दी थी। लेकिन जल्द ही कॉलेज के उप-कुलपति ने ओशो के ट्रांसफर की मांग कर दी थी, क्योंकि वह अपने छात्रों की नैतिकता, चरित्र और धर्म के लिए उन्हें खतरा मानता था।

साल 1958 में उन्होंने जबलपुर यूनिवर्सिटी में फिलोसोफी लेक्चरर के रूप में पढ़ाना शुरु कर दिया था, वर्ष 1960 में उन्हें प्रमोट करते हुए प्रोफेसर बना दिया गया। आगे चलकर वो एक पब्लिक स्पीकर बने, जिसका उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनुसरण किया। 1960 के दशक तक उन्हें आचार्य रजनीश के रूप में जाना गया, 70 के दशक के दौरान वो गुरु श्री रजनीश हुए, 1989 में वो आम जनता के बीत ओशो के रूप में जाने गए।

साल 1966 में, उन्होंने विश्वविद्यालय से इस्तीफा दे दिया और एक गुरु और पब्लिक स्पीकर बन गए। एक सार्वजनिक वक्ता के रूप में उन्होंने पूरे भारत की यात्रा भी की। समाजवाद और संस्थागत धर्मों की उनकी मुखर आलोचना और कामुकता के प्रति अधिक खुले रवैये ने उन्हें हमेशा विवादों में रखा।

1981 में संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए थे ओशो

1970 में कुछ समय के लिए बंबई (जो आज का मुंबई) में बसने के बाद, ओशो ने एक आध्यात्मिक गुरू की भूमिका निभाई और शिष्यों को दीक्षा देना शुरू कर दिया, जिन्हें नव-संन्यासी के रूप में जाना जाता था।

1974 में पुणे में घूमते हुए उन्होंने एक आश्रम की स्थापना की जिसने पश्चिमी देशों के लोगों को बड़ी मात्रा में अपनी ओर आकर्षित किया। ओशो 1981 में संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए और उनके अनुयायियों ने एक अंतरराष्ट्रीय समुदाय की स्थापना की, जिसे बाद में ओरेगन राज्य में रजनीशपुरम के रूप में जाना गया।

1985 में ओरेगन कम्यून तब खत्म हो गया जब खुद ओशो ने ही खुलासा किया कि कम्यून में आगजनी, हत्या का प्रयास, ड्रग तस्करी आदि सहित कई गंभीर अपराध हुए हैं। कुछ ही समय बाद उन्हें अमेरिकी प्रशासन ने नियमों के उल्लंघनों के आरोप में गिरफ्तार किया और अमेरिका से निर्वासित कर दिया गया। कई देशों की यात्रा करने के बाद वह पुणे लौट आए जहां 19 जनवरी, 1990 को ओशो की मृत्यु हो गई।

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