जयंती: आज़ाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री बने थे मौलाना अबुल कलाम आजाद

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आज़ाद भारत के पहले शिक्षा रहे मौलाना अबुल कलाम आजाद की आज 132वीं जयंती है। वह एक विद्वान, इस्लामी धर्मशास्त्री, स्वतंत्रता कार्यकर्ता, और आज़ादी के आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेताओं में से एक थे। भारत की शिक्षा नीतियों को आकार देने का श्रेय मौलाना अबुल कलाम आजाद को ही दिया जाता है। देश के शिक्षा से जुड़े कई प्रमुख संस्थानों की नींव उनके रहते हुए ही रखी गई थी। मौलाना आजाद के सम्मान में उनकी जयंती को ‘राष्ट्रीय शिक्षा दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है। ऐसे में इस ख़ास मौके पर जानिए उनके बारे में..

मक्का में हुआ था मौलाना आजाद का जन्म

अबुल कलाम आजाद का जन्म मौलाना खैरुद्दीन बंगाली के घर 11 नवंबर, 1888 को सऊदी अरब के मक्का में हुआ था। आजाद का मूल नाम अबुल कलाम गुलाम मोईउद्दीन था। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि आजाद के पुरखे अफगानिस्तानी थे और बंगाल में आकर बसे थे। वर्ष 1857 में जब ब्रिटिश सरकार का विद्रोह तेज हुआ तो वो भारत छोड़कर अरब चले गए। हालांकि, आजाद के पैदा होने के 2 साल बाद ही उनका परिवार फिर भारत आ गया।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे आजाद

अबुल कलाम आजाद शुरू से ही तेज बुद्धि के थे और कम उम्र में उन्हें हिंदी उर्दू के अलावा फारसी, बंगाली, अरबी और अंग्रेजी सहित कई भाषाएं आने लग गई थी। आगे चलकर उन्होंने एक शानदार कवि, लेखक, पत्रकार के तौर पर सभी के बीच अपनी पहचान कायम की।

अबुल कलाम आजाद का हथियार थी कलम

परिवार में रूढ़िवादी माहौल होने के बावजूद मौलाना अबुल कलाम आजाद खुले विचारों वाले थे। अपने युवा दिनों में आजाद ने ‘लिसान-उल-सिद’ नाम की पत्रिका निकालीं। वहीं, वर्ष 1912 में उन्होंने ‘अल हिलाल’ नामक उर्दू अखबार निकाला, जिसके वो खुद ही संपादक थे। कहा जाता है कि इस अखबार को निकालने का मुख्य उद्देश्य कौमी एकता बरकरार रखना था।

जरूरत पड़ने पर क्रांतिकारी की भूमिका निभाई

मौलाना अबुल कलाम आजाद ने देश की आजादी के लिए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था। महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए ‘असहयोग आंदोलन’ में वो शामिल हुए। वहीं, अंग्रेजों की गलत नीतियों के खिलाफ उन्होंने आवाज उठाईं। माना जाता है कि अबुल कलाम आजाद बंटवारे के खिलाफ थे। बंटवारे के समय देश में जब दंगे भड़के तब उन्होंने सौहार्द कायम करने के लिए हिंसा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया था।

शिक्षा के क्षेत्र में नीतिगत ढ़ांचे की नींव रखीं

आजादी के बाद भारत में शिक्षा क्षेत्र के नीतिगत ढ़ांचे की जरूरत थी। इसके लिए मौलाना अबुल कलाम आजाद को जिम्मेदारी दी गईं। नेहरू मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी निभाने वाले आजाद ने आधुनिक शिक्षा में अपना अहम योगदान दिया। मौलाना आजाद ने 22 फरवरी, 1958 को आखिरी सांस ली, उनकी हार्ट अटैक की वजह से मौत हुईं। भारत सरकार ने मौलाना अबुल कलाम आजाद को सम्मान देने के लिए वर्ष 2008 से उनकी जयंती पर हर साल 11 नवंबर को ‘राष्ट्रीय शिक्षा दिवस’ मनाने का फैसला किया। कांग्रेस सरकार ने वर्ष 1992 में मौलाना को मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा।

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