जयंती: 22 वर्ष की उम्र में 34वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री में बतौर सिपाही भर्ती हुए थे मंगल पांडे

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भारत की आज़ादी के लिए ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति का आगाज करने वाले शुरुआती स्वतंत्रता क्रांतिकारियों में से एक मंगल पांडे की आज 195वीं जयंती है। उनके द्वारा भड़काई गई क्रांति की ज्वाला से अंग्रेजी हुकूमत की जड़े हिल गई थीं। मंगल पांडे ने चर्बी लगे कारतूसों को इस्तेमाल करने से मना कर दिया था। यहां तक कि उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया। हालांकि, बाद में अंग्रेजों ने वर्ष 1857 के विद्रोह को दबा दिया, पर मंगल पांडे की शहादत ने देश में लोगों के बीच जो क्रांति के बीज बोए, उसके बाद भारत से अंग्रेजी शासन को बाहर करने में 100 साल से कम समय लगा था। ऐसे में इस खास मौके पर जानते हैं महान क्रांतिकारी मंगल पांडे के बारे में दिलचस्प बातें…

स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे का जीवन परिचय

क्रांतिकारी मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई, 1827 को उत्तरप्रदेश के बलिया जिले स्थित नगवा गांव के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम दिवाकर पांडे और माता का नाम अभय रानी था। वर्ष 1849 में वे ’34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री’ सेना की पैदल टुकड़ी में भर्ती हो गए और मंगल इसमें 1446 नंबर के सिपाही थे। माना जाता है कि भारत की आजादी के वर्ष 1857 के संग्राम की शुरुआत उन्हीं के विद्रोह से हुई।

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ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ इसलिए खड़े हुए

जब भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन था, तब कंपनी भारतीय जनता में से ही सैनिकों की भर्ती करती थी। मंगल पांडे 22 वर्ष की उम्र में कंपनी की 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री में एक सिपाही के रूप में भर्ती हो गए थे। ईस्ट इंडिया कंपनी की सैनिक टुकड़ियों में पहले से ही भारतीय सैनिकों के साथ भेदभाव होते थे। ​अंग्रेज उनको हीन भाव से देखा करते थे और भारतीयों का धर्म भ्रष्ट करने का कोई भी मौका नहीं गंवाते थे। ऐसे में देशी सैनिकों में लगातार असंतोष बढ़ता जा रहा था।

बैरकपुर में पोस्टिंग के दौरान हुई एक घटना-क्रम ने मंगल पांडे का जीवन बदल दिया था। ब्रिटिश सरकार ने भारत में नई राइफल लांच की, जिसका नामक एनफील्ड राइफल था। इसका उपयोग भारतीय सैनिकों को करना था। इस राइफल में प्रयुक्त कारतूसों के मुंह पर गाय और सूअर की चर्बी लगी होती थी, जिसके उपयोग करने को हिन्दू-मुसलमान सैनिक अपने धर्म के विरूद्ध मानते थे।

इन कारतूस के उपयोग से हिन्दू-मुस्लिम सैनिकों में आक्रोश फैलने लगा, क्योंकि राइफल का उपयोग करते समय सैनिकों को पहले कारतूस पर लगे चर्बी को मुंह से छीलकर हटाना पड़ता था। इस कारण भारतीय सैनिकों को लगने लगा की अंग्रेज उनकी धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। मंगल पांडे भी उन सैनिकों में से एक थे। इससे वे क्रोधित हुए और उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने की योजना बनाई।

अंग्रेज अधिकारी मेजर ह्यूसन को मौत के घाट उतारा

ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा गाय और सुअर की चर्बी लगे कारतूसों के उपयोग से भारतीयों के धार्मिक हितों को ठेस पहुंच रही थी, ऐसे में 29 मार्च 1857 को मंगल पांडे ने अंग्रेज अधिकारियों के आदेश मानने से इनकार कर दिया। वे परेड ग्राउंड से रेजिमेंट गार्ड रूम पर पहुंचे और अन्य सैनिकों को भी विद्रोह के लिए उकसाने लगे। उनकी राइफल छीनने के लिये आगे बढे अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन को उन्होंने मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद पांडे ने एक और अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट बॉघ को भी मार गिराया था। आखिर में मंगल पांडे को अंग्रेज सिपाहियों ने पकड़ लिया। इस प्रकार चर्बी लगे कारतूस का प्रयोग ईस्ट इंडिया कंपनी शासन के लिए घातक सिद्ध हुआ और पांडे ने बैरकपुर छावनी में 29 मार्च, 1857 को अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया।

पांडे ने ‘मारो फिरंगी को’ नारा दिया

क्रांतिकारी मंगल पांडे ने अंग्रेजों के विरूद्ध स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ‘मारो फिरंगी को’ का नारा दिया। उस समय देश में अंग्रेजों को फिरंगी के नाम से पुकारा जाता था।

पांडे को तय समय से पहले दी गई फांसी

मंगल पांडे पर कोर्ट मार्शल द्वारा मुकदमा चलाकर 6 अप्रैल, 1857 को फांसी की सजा सुना दी गयी। फैसले के अनुसार उन्हें 18 अप्रैल, 1857 को फांसी दी जानी थी, पर ब्रिटिश सरकार ने पांडे को निर्धारित तारीख से दस दिन पूर्व में ही 8 अप्रैल, 1857 को फांसी दे दी। इस तरह मंगल पांडे ने खुद को देश के लिए बलिदान कर दिया।

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