विशेष: महाराणा प्रताप ने मुगल शासकों की दासता को नकार देश के नाम कर दिया था अपना पूरा जीवन

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भारतीय के गौरवशाली इतिहास में राजपुताना का अपना एक अलग महत्व रहा है। राजपुताना समाज ने देश को कई रणबांकुरें, योद्धा और वीर दिए जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना देश की स्वाधीनता की रक्षा अंतिम सांस तक की। आज संपूर्ण भारत इन वीरों के बलिदान को याद कर गर्व महसूस करता है। इन वीरों में वीरभूमि मेवाड़ का अपना एक अलग स्थान है जहां बप्पा रावल, खुमाण प्रथम महाराणा हम्मीर, महाराणा कुम्भा, महाराणा सांगा, उदयसिंह और महाराणा प्रताप जैसे वीरों ने जन्म लिया।

मेवाड़ के महान राजपूत राजा महाराणा प्रताप का नाम पराक्रम और शौर्य की मिसाल के तौर पर पूरी दुनिया में लिया जाता है। मुगल शासकों की दासता को नकारने वाले इस राजपूत सम्राट ने सबकुछ त्याग कर अपना पूरा जीवन देश के नाम कर दिया। 9 मई को महाराणा प्रताप की 482वीं जयंती है, ऐसे में इस ख़ास मौके पर जानते हैं इस वीर योद्धा के बारे में कुछ दिलचस्प बातें..

महाराणा को चेतक घोड़े से था बेहद लगाव

महाराणा प्रताप का बचपन का नाम कीका था।  उन्होंने कुल 11 शादियां की थी, उनसे राणा को 17 बेटे और 5 बेटियां हुईं। राणा के बहादुरी के हर किस्से में उनके घोड़े चेतक का नाम जरूर आता है। ऐसी किवदंतियां हैं कि युद्ध में मुगल सेना के पीछे पड़ने पर चेतक ने राणा को अपनी पीठ पर बैठाकर हजारों फीट लंबे नाले को पार करवाया था। आज भी हल्दी घाटी में राणा की समाधि के पास ही चेतक की समाधि बनी हुई है। कहा जाता है कि महाराणा प्रताप युद्ध में जो भाला उठाते थे, वो 81 किलो का था और वे छाती पर 72 किलो का कवच पहनते थे।

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हल्दीघाटी के युद्ध में आखिरी सांस तक नहीं मानी हार

मुगल बादशाह अकबर और महाराणा प्रताप के बीच हुए हल्दीघाटी के युद्ध को आज तक कोई नहीं भूला है। हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून, 1576 ई. को हुआ था। हल्दीघाटी के युद्ध के बारे में ऐसा कहा जाता है कि इस युद्ध में न तो अकबर जीता था और न ही राणा हारे थे। हल्दी घाटी के युद्ध के दौरान महाराणा प्रताप की सेना में 20000 सैनिक थे और अकबर की सेना में 85000 सैनिक थे।

सैनिकों की कमी के बावजूद भी महाराणा प्रताप ने आखिरी सांस तक हार स्वीकार नहीं की। आजीवन सीमित संसाधनों और अभाव की जिंदगी जीने वाले महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 को राजस्थान के राजसमंद जिले स्थित कुंभलगढ़ किले में हुआ था और वर्ष 1597 में एक हादसे के बाद 19 जनवरी को उनका देहांत हो गया था।

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