मदन मोहन मालवीय: भारत में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना

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Madan Mohan Malviya

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की 25 दिसंबर को 158वीं जयंती हैं। वह एक प्रसिद्ध शिक्षाविद, वकील, राजनीतिज्ञ थे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के चार बार अध्यक्ष रह थे। उन्हें ‘महामना’ के रूप में भी पुकारा जाता था। उन्होंने हिंदुओं में आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा देने का प्रयास किया था। वह वर्ष 1919 से 1938 तक बीएचयू के कुल​पति थे।

मालवीय को मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ मरणोपरांत 24 दिसंबर, 2014 को उनकी 153वीं जयंती के अवसर पर प्रदान किया गया।

जीवन परिचय

मदन मोहन मालवीय का जन्म 25 दिसंबर, 1861 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित बैजनाथ और माता मून देवी मालवीय था। उनका मूल उपनाम चतुर्वेदी था। उनके पूर्वज मालवा से आकर इलाहाबाद आकर बस गए थे। इस वजह से उन्होंने अपना सरनेम मालवीय लगाया। उनके पिता संस्कृत शास्त्रों के विद्वान थे।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत में पाठशाला में हुआ था। बाद में एक अंग्रेजी स्कूल में शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने बचपन में ‘मकरंद’ नाम से कविताएं लिखना शुरू की। उन्होंने वर्ष 1879 में मुइर सेंट्रल कॉलेज से मैट्रिक उत्तीर्ण की। उन्हें हैरिसन कॉलेज के प्रधानाचार्य ने मासिक छात्रवृत्ति प्रदान की, जिससे उनको आर्थिक सहायता मिली। मालवीय ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक किया था।

वह संस्कृत से मास्टर डिग्री हासिल करना चाहते थे लेकिन ऐसा नहीं हो सका। बाद में वर्ष 1884 में उन्होंने इलाहाबाद के सरकारी हाई स्कूल में सहायक मास्टर के रूप में पढ़ाना शुरू कर दिया।

देश की आजादी में योगदान

मदन मोहन मालवीय ने दिसंबर, 1886 में द्वितीय कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया। यही से उनका राजनीतिक कॅरियर शुरू हुआ। उन्होंने जुलाई 1887 में स्कूल की नौकरी छोड़ दी और हिंदुस्तान का संपादक बन गए। बाद में एलएलबी करने के लिए इलाहाबाद गए और साथ में यहां पर उन्हें इंडियन ओपिनियन का सह-संपादक बनाया गया। उन्होंने कानून की डिग्री लेने के बाद वर्ष 1891 में इलाहाबाद जिला न्यायालय में कानून का अभ्यास शुरू किया।

मालवीय वर्ष 1909, 1918, 1932 और 1933 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने। वह एक उदारवादी नेता थे। महात्मा गांधी द्वारा “महामना” की उपाधि प्रदान की गई थी। उन्होंने अभ्युदय का संपादन भी किया।

कई मौकों पर उन्हें हिंदू राष्ट्रवादी दिखाने की कोशिश की जाती है लेकिन उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने के लिए कार्य किया। उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द्र को बढ़ावा देने के लिए लाहौर और कानपुर में भाषण भी दिए। दक्षिणपंथी हिंदू महासभा के प्रारंभिक नेताओं में से एक मालवीय समाज सुधारक और सफल सांसद थे।

उन्होंने वर्ष 1915 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।

153 क्रांतिकारियों को फांसी की सजा से बचाया

असहयोग आंदोलन में चौरी चौरा घटना में गिरफ्तार क्रांतिकारियों का उन्होंने मुकदमा लड़ा। इस समय वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकालत कर रहे थे। तो उन्होंने उनमें से 153 क्रांतिकारियों को फांसी की सजा से बचाया था।

उन्होंने अंग्रेजी समाचार पत्र ‘द लीडर’ का प्रकाशन वर्ष 1909 में इलाहाबाद से किया। वर्ष 1930 में नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया और अपनी गिरफ्तारी दी।

मालवीय इलाहाबाद नगरपालिका बोर्ड में सक्रिय रहे। वह वर्ष 1903-1918 के दौरान प्रॉविन्शियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य, सेंट्रल काउंसिल, 1916-1918 के दौरान इंडियन लेजिस्लेटिव असेंबली के निर्वाचित सदस्य रहे। उन्होंने वर्ष 1931 में हुए दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया। उन्होंने वर्ष 1937 में सक्रिय राजनीति से अलविदा कह दिया था।

बाद में अपना पूरा ध्यान सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित कर दिया। मदन मोहन मालवीय ने विधवाओं के पुनर्विवाह का समर्थन और बाल विवाह का विरोध करने के साथ ही महिलाओं की शिक्षा के लिए काम किया।

निधन

मदन मोहन मालवीय का निधन 12 नवंबर, 1946 को हुआ।

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