समाज में फैली कुरीतियों पर प्रहार करते हुए अपने शब्दों से खूब लड़ा भोजपुरी का ये शेक्सपीयर

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भोजपुरी के शेक्सपीयर कहे जाने वाले लोक कलाकार भिखारी ठाकुर का जिक्र आज करना बेहद जरूरी है। 18 दिसंबर 1887 को छपरा के कुतुबपुर दियारा गांव में एक निम्नवर्गीय नाई परिवार में जन्म लेने वाले भिखारी ठाकुर ने पिछड़ती जा रही भोजपुरी संस्कृति को नया जीवन दिया। सिर्फ इतना ही नहीं वह भोजपुरी के समर्थ लोक कलाकार होने के साथ ही रंगकर्मी, लोक जागरण के सन्देश वाहक, नारी विमर्श और दलित विमर्श के उद्घोषक, लोक गीत तथा भजन कीर्तन के अनन्य साधक भी रहे हैं। आज ही के दिन यानि 10 जुलाई 1971 को वे इस दुनिया से चले गए।

उनकी रचनाएं सबसे अलग और बेहद खास हुआ करती थीं। वो भोजपुरी संस्कृति को सामाजिक सरोकारों के साथ कुछ इस तरह पिरोया करते थे कि अभिव्यक्ति की वो शैली ‘भिखारी शैली’ ही कहलाई जाने लगी। आज भी सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करते हुए जब कभी ठाकुर के नाटकों की गूंज सुनाई पड़ती है, लोगों के मन में एक अलग ही आग उठने लगती है, जो शायद हर किसी के मन में नए बदलाव की आशा भरती है। साहस को अपना कर आगे चलने के लिए प्रेरित करती है।

गवना कराइ सैंया घर बइठवले से,
अपने लोभइले परदेस रे बिदेसिया।।
चढ़ली जवनियाँ बैरन भइली हमरी रे,
के मोरा हरिहें कलेस रे बिदेसिया।

यानी गौना कराकर सैयां मुझे घर बिठाकर पैसे के लोभ में परदेस चले गए हैं..मेरी चढ़ती जवानी मेरी दुश्मन बन गई है…नवोढ़ा पूछती है, भरी जवानी में मुझे घर में छोड़कर विदेश जा बसे परदेसी, आखिर मेरा दर्द कौन दूर करेगा…

bhikhari-thakur

भिखारी ठाकुर लोक कलाकार ही नहीं थे, बल्कि वो जीवन भर सामाजिक कुरीतियों और बुराइयों के खिलाफ कई स्तरों पर जूझते रहे। उनके निर्देशन में बनी भोजपुरी फिल्म ‘बिदेसिया’ आज भी लाखों-करोड़ों दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनी हुई है। वहीं उनके कई भोजपुरी नाटकों जैसे ‘बेटी बेचवा’, ‘गबर घिचोर’, ‘बेटी वियोग’ का आज भी मंचन होता रहता है। इन नाटकों और फिल्मों के माध्यम से भिखारी ठाकुर ने सामाजिक सुधार की दिशा में अदभुत पहल की थी।

फिल्म बिदेसिया की ये दो पंक्तियां भोजपुरी लोगों के बीच मुहावरे की तरह आज भी गूंजती हैं :

“हंसि हंसि पनवा खीऔले बेईमनवा कि अपना बसे रे परदेश

कोरी रे चुनरिया में दगिया लगाई गइले, मारी रे करेजवा में ठेस!”

भिखारी ठाकुर के व्यक्तित्व में कई आश्चर्यजनक विशेषताएं थी। मात्र अक्षर ज्ञान के बावजूद पूरा रामचरित मानस उन्हें कंठस्थ था। शुरुआती जीवन में वह रोजी-रोटी के लिए अपना घर छोडकर खड़गपुर चले गए थे। करीब तीस वर्षों तक वो पारंपरिक पेशे से जुड़े रहे और फिर अपने गांव लौटे तो लोक कलाकारों की एक नृत्य मंडली बनाई, जिनके साथ मिलकर वो रामलीला करने लगे। वहीं कई स्तरों पर कला-साधना करने के साथ ही वो भोजपुरी साहित्य की रचना में भी लगे रहे।

भिखारी ठाकुर ने कुल 29 पुस्तकें लिखीं। वह भोजपुरी साहित्य और संस्कृति के समर्थ प्रचारक और संवाहक बने। उनके सभी नाटकों में बदलाव को दिशा देने वाले एक सामाजिक चिंतक की व्यथा साफ दिखती है। वह अक्सर अपने नाटकों में सूत्रधार बनते और अपनी बात बड़े चुटीले अंदाज़ में कह जाते थे। भारत सरकार ने उन्हें उनके योगदान के लिए पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया। 10 जुलाई 1971 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।

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