जयंतीः पूरे जीवनभर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भारतीय राष्ट्रवाद को मजबूत करने में जुटे रहे लाला लाजपत राय

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एक दौर था जब देश में ब्रिटिश साम्राज्य की तूती बोलती थी, लोग अत्याचारों के एक बुरे दौर से गुजर रहे थे, तब अंग्रेजों को यह लगने लग गया था वो ही सर्वशक्तिमान हैं, उस समय ब्रिटिश राज यह मानता था कि उनके शासन को कोई हिला नहीं सकता है। वर्ष 1928 में एक शख्स को ब्रिटिश पुलिस ने लाठियों से बड़ी ही निर्ममता से पीटा, आखिरकार इस मौत के बाद ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिलने लगीं। जी हां, दिन था 30 अक्टूबर 1928 का और पंजाब में महान स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय की मौत के साथ ही भारत की आजादी की कहानी लिखनी शुरू हो गई थी। 28 जनवरी को लाला लाजपत राय की 157वीं जयंती है। ऐसे में इस मौके पर जानते हैं स्वंतत्रता संग्राम में उनके योगदान के बारे में दिलचस्प बातें..

उर्दू-पर्शियन टीचर के घर हुआ था जन्म

लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी, 1865 को पंजाब के धुडीके में मुंशी राधाकृष्ण अग्रवाल और गुलाब देवी के घर में हुआ था। उनकी शुरुआती शिक्षा गवर्मेंट हायर सेकंडरी स्कूल, धुडीके में हुई। लाजपत राय को पिता से राष्ट्रवादी विचार मिले, वहीं माता से उन्होंने धार्मिक आस्था के गुण सीखे। आगे चलकर लाजपत राय ने अपने विचारों को सहेज कर रखा। साथ ही उनके विचारों की झलक ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आंदोलनों और पत्रकारिता में भी दिखीं। स्कूली शिक्षा पूरी होने के बाद वर्ष 1880 में लाजपत राय ने कानून की पढ़ाई करने के लिए गवर्मेंट कॉलेज लाहौर में एडमिशन लिया।

दयानंद सरस्वती से मुलाकात के बाद आए बदलाव

कॉलेज के दिनों में लाला लाजपत राय की मुलाकात आर्य समाज के महान विचारक स्वामी दयानंद सरस्वती से हुई थी। उनसे मिलने के बाद लाजपत राय की ज़िंदगी और सोच में कई बदलाव आए। आगे चलकर लाजपत राय लाहौर में आर्य समाज के सदस्य बने और फिर वहीं से ‘आर्य गैजेट’ निकाला।

लाजपत राय ने गरम दल का किया था गठन

वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 1892 में लाला लाजपत राय ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरम दल के विरोध में ‘गरम दल’ बनाया। बंगाल के विभाजन के खिलाफ चल रहे आंदोलन का भी मुख्य चेहरा लाजपत राय ही थे। उस समय के क्रांतिकारी सुरेंद्रनाथ बनर्जी, बिपिन चंद्र पाल और अरविंद घोष के साथ लाजपत राय ने स्वदेशी अभियान चलाया और उसे पूरे देश में मजबूत किया।

विदेश में दिखाया अपने विचारों का दमखम

लाल लाजपत राय ने अपने विचारों से भारत के लोगों को प्रभावित करने के साथ ही विदेशों में भी अपनी बात उसी जोश में रखीं। वर्ष 1914 में वे ब्रिटेन चले गए, फिर वहां से आगे वो संयुक्त राज्य अमेरिका पहुंचे। विदेश में रहते हुए लाला लाजपत राय ने ‘इंडियन होम लीग ऑफ़ अमेरिका’ बनाई। उस दौरान ही प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया था, जिसके कारण लाजपत राय वर्ष 1920 में वापस देश लौट आए।

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साल 1929 में साइमन कमीशन के भारत आने पर लाला लाजपत राय ने खुलकर उसका विरोध किया और कई जुलूस निकाले। इसी दौरान एक जुलूस में ब्रिटिश सरकार ने लाजपत राय को बेरहमी से पीटा, जिसके कारण उनके सिर में गंभीर चोटें आईं और 17 नवंबर, 1928 को उनकी मौत हो गई थी। इस तरह भारत माता का एक सपूत हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कह गया।

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