के आर नारायणन: इस वजह से क्लासरूम से बाहर सुनते थे लेक्चर, बने देश के 10वें राष्ट्रपति

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भारत के 10वें राष्ट्रपति के आर नारायणन की 9 नवंबर को 14वीं डेथ एनिवर्सरी है। वह बतौर राष्ट्राध्यक्ष के रूप में वोट देने वाले पहले राष्ट्रपति थे। उन्होंने वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव में पहला वोट डाला था। यही नहीं नारायणन पहले दलित व्यक्ति थे जो राष्ट्रपति बने।

जीवन परिचय

के आर नारायणन का जन्म 27 अक्टूबर, 1920 को केरल राज्य के त्रावणकोर के पेरुमथानम उझावूर गांव में हुआ था। उनका पूरा नाम कोचेरील रमन नारायणन था। उनका जन्म एक गरीब दलित परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा सरकारी प्राइमरी स्कूल, कुरिचिथमम में हुई। बाद में वह प्रति दिन 15 किमी पैदल चलकर पढ़ने जाते थे। उन्हें अक्सर फीस न चुका पाने के कारण क्लासरूम से बाहर ही लेक्चर सुनना पड़ता था।

नारायणन ने पढ़ाई में कभी पैसों को कमजोरी नहीं बनने दिया। वह प्रारंभ से ही होशियार थे। आर्थिक तंगी के बाद भी वर्ष 1943 में उन्होंने स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की और त्रावणकोर विश्वविद्यालय (वर्तमान में केरल विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाता है) से अंग्रेजी साहित्य में मास्टर डिग्री हासिल की। उन्होंने विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान हासिल किया। नारायणन त्रावणकोर में प्रथम श्रेणी में डिग्री प्राप्त करने वाले पहले दलित छात्र बने।

कॅरियर

नारायणन अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली चले गए और एक पत्रकार के रूप में नौकरी करने लगे। उन्होंने वर्ष 1944-45 में हिंदू और द टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे समाचार पत्रों में काम किया। इस दौरान उन्होंने महात्मा गांधी का इंटरव्यू भी लिया था। नारायणन के मन में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड जाने की इच्छा थी। आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से उन्हें थोड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्होंने इसके लिए जे आर डी टाटा से मिले। टाटा ने उन्हें एक छात्रवृत्ति प्रदान की। इससे वह वर्ष 1945 में इंग्लैंड पढ़ने गए और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एलएसई) में राजनीति विज्ञान का अध्ययन किया।

राजनीतिक जीवन

वर्ष 1948 में वह भारत लौट आए। यहां पर उन्होंने पं. जवाहर लाल नेहरू से मुलाकात की। बाद में उन्हें भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) में नौकरी की पेशकश की। नारायणन ने वर्ष 1949 में आईएफएस में नौकरी की। इस दौरान नारायणन रंगून, टोक्यो, लंदन, हनोई और कैनबरा में राजनयिक के रूप में अपनी सेवाएं दी। उन्होंने भारत के राजदूत के रूप में थाईलैंड, तुर्की और चीन में अपनी सेवाएं प्रदान की। वह वर्ष 1978 में आईएफएस से रिटायर हो गए।

इसके बाद कुछ समय उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति (जेएनयू) के रूप में कार्य किया। इंदिरा गांधी के समय में उन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका में भारत का राजदूत नियुक्त गया।

वर्ष 1984 में नारायणन ने इंदिरा गांधी के कहने पर राजनीति में प्रवेश किया। उन्होंने वर्ष 1984, 1989 और 1991 में केरल के ओट्टापल्लम संसदीय क्षेत्र से तीन बार चुनाव जीतकर संसद में अपनी जगह बनाई। उन्हें राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री का पद दिया गया।

देश के नवें उप-राष्ट्रपति और 10वें राष्ट्रपति बने

के आर नारायणन को 21 अगस्त, 1992 को 9वें उप—राष्ट्रपति चुने गए। वह इस पद पर वर्ष 1997 तक रहे। वह 14 जुलाई, 1997 को हुए राष्ट्रपति चुनाव में विजयी हुए। इस चुनाव में नारायणन को कुल मतों का 95 प्रतिशत प्राप्त हुआ। के आर नारायणन को 25 जुलाई, 1997 को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जे. एस. वर्मा ने राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई थी। वह इस पद पर 25 जुलाई, 2002 तक रहे।

उनके द्वारा लिखित पुस्तकें

के आर नारायणन ने अपने जीवन काल में कुछ पुस्तकें लिखीं, जिनमें ‘इण्डिया एण्ड अमेरिका एस्सेस इन अंडरस्टैडिंग’, ‘इमेजेस एण्ड इनसाइट्स’ और ‘नॉन अलाइमेंट इन कन्टैम्परेरी इंटरनेशनल रिलेशंस’ प्रमुख हैं।

उनको अमेरिका के टोलेडो विश्वविद्यालय ने ‘डॉक्टर ऑफ साइंस’ की तथा ऑस्ट्रेलिया विश्वविद्यालय ने ‘डॉक्टर ऑफ लॉस’ की उपाधि प्रदान की थी।

निजी जीवन

के आर नारायणन जब आईएफएस के दौरान बर्मा नियुक्त हुए तब उनकी मा टिंट टिंट नामक एक युवती से मुलाकात हुई। दोनों 8 जून, 1951 को शादी के बंधन में बंध गए। बाद में वह भारतीय नागरिक बन गई और अपना नाम उषा रखा। उनकी पत्नी विदेशी मूल की एकमात्र महिला थी जो भारत की पहली महिला बनीं। उनकी दो बेटियां थी।

निधन

के आर नारायणन के गुर्दें में तकलीफ होने की वजह से उन्हें आर्मी रिसर्च एण्ड रैफरल हॉस्पिटल, नई दिल्ली इलाज के लिए ले जाया गया। उनका इसी हॉस्पिटल में 9 नवम्बर, 2005 को निधन हो गया।

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