कल्पना दत्त: सूर्यसेन के क्रांतिकारी संगठन से जुड़कर देश की आजादी के लिए लड़ने वाली ​’वीर महिला’

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kalpana datt

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं ने भी अभूतपूर्व योगदान दिया था। ऐसी ही क्रांतिकारी महिला कल्पना दत्त की 8 फरवरी को 25वीं पुण्यतिथि हैं। उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए क्रांतिकारी सूर्य सेन के संगठन से जुड़ गई। वर्ष 1930 में चटगांव शस्त्रागार को लूट था। आजादी के बाद वह कम्युनिस्ट में शामिल हो गईं।

जीवन परिचय

कल्पना दत्त का जन्म 27 जुलाई, 1913 को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रांत में चटगांव (अब बांग्लादेश) के श्रीपुर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम विनोद बिहारी दत्त था। उन्होंने वर्ष 1929 में चटगांव से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। बाद में वह कलकत्ता पढ़ने के लिए चली गईं। वहां बेथ्यून कॉलेज में स्नातक करने के लिए विज्ञान संकाय में दाखिला लिया। वह महिला छात्र संघ में शामिल हो गईं, जो एक अर्ध-क्रांतिकारी संगठन था। उनकी मुलाकात इस दल में शामिल बीना दास और प्रीतिलता वाडेकर हुई।

उन्होंने बचपन में अनेक प्रसिद्ध क्रान्तिकारियों की जीवनियां पढ़ी, जिन्होंने उन्हें काफी प्रभावित किया। वह भी देश के लिए कुछ करने के लिए आतुर हो उठीं।

क्रांतिकारी संगठन से जुड़ना

छात्र संघ में रहते वह बाद में क्रांतिकारी सूर्यसेन के संगठन ‘इंडियन रिपब्लिकन आर्मी’ से जुड़ी और क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने लगी। सूर्यसेन को ‘मास्टर दा’ के नाम से भी जाना जाता था। वह अंग्रेज़ों के खिलाफ मुहिम का हिस्सा बन गईं।

जब सूर्यसेन के नेतृत्व में आईआरए के सदस्यों ने 18 अप्रैल, 1930 ई. को ‘चटगांव शस्त्रागार’ लूट लिया तब से ही कल्पना पर अंग्रज़ों की निगरानी अधिक बढ़ गई। उनको अपनी पढ़ाई छोड़कर वापस गांव आना पड़ा, लेकिन उन्होंने संगठन नहीं छोड़ा। अंग्रेजों शस्त्रागार लूट से बौखला गए और उन्होंने इस संगठन के कई लोग गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। कल्पना ने सगंठन के लोगों को आज़ाद कराने के लिए जेल के अदालत को उड़ाने की योजना बनाई।

जमानत पर छूटने के बाद वह भूमिगत हो गई। 17 फरवरी 1933 को पुलिस ने गीरिला गांव में उनके छिपने के स्थान को घेर लिया, और उस छापेमारी में सूर्य सेन को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन कल्पना वहां से भागने में सफल रही।

अंततः 19 मई 1933 को उसे गिरफ्तार कर लिया गया। चटगाँव शस्त्रागार मामले के दूसरे पूरक परीक्षण में, कल्पना को जीवन के लिए परिवहन की सजा सुनाई गई। वह 1939 में रिहा हुई।

आजीवन कारावास की मिली सजा

वह अपना वेश बदलकर क्रांतिकारियों को गोला-बारूद सप्लाई करती थी। उन्होंने निशाना लगाने का भी प्रशिक्षण लिया। कल्पना और उनके साथियों ने क्रान्तिकारियों का मुकदमा सुनने वाली अदालत के भवन को और जेल की दीवार उड़ाने की योजना बनाई। परंतु इस योजना की किसी ने सूचना पुलिस को दे दी। कल्पना को पुरुष वेश में हुए गिरफ्तार कर लिया, पर अपराध साबित न हो पाने की वजह से उन्हें रिहा कर दिया गया।

बाद में शंका की वजह से उनके घर पुलिस का पहरा बैठा दिया गया। लेकिन कल्पना पुलिस को चकमा देकर घर से निकलकर क्रान्तिकारी सूर्यसेन से जा मिलीं। सूर्यसेन के ​गिरफ्तार होने के बाद मई, 1933 में कुछ समय तक पुलिस और क्रान्तिकारियों के बीच सशस्त्र संघर्ष चलता रहा। बाद में कलपना को भी गिरफ्तार कर लिया गया। मुकदमा चला और फरवरी, 1934 में सूर्यसेन तथा तारकेश्वर दस्तीकार को फांसी की और 21 वर्ष की कल्पना दत्त को आजीवन कारावास की सज़ा हो गई।

बाद में वर्ष 1937 ई. में जब पहली बार प्रदेशों में भारतीय मंत्रिमंडल बने तब गांधी जी, रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि के विशेष प्रयत्नों से कल्पना जेल से बाहर आ सकीं। इसके बाद उन्होंने पढ़ाई पूरी की।

कल्पना दत्त ने वर्ष 1940 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक किया और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गईं। उन्होंने 1943 के बंगाल के अकाल के दौरान और बंगाल के विभाजन के दौरान एक राहत कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया।

उन्होंने वर्ष 1943 में कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पूरन चंद जोशी से शादी कर ली। सितम्बर, 1979 में कल्पना दत्त को पुणे में ‘वीर महिला’ की उपाधि से सम्मानित किया गया।

निधन

क्रांतिकारी कल्पना का 8 फ़रवरी, 1995 को कल्लकता में निधन हो गया।

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