देश की आजादी में तन, मन और धन से सहयोग दिया था उद्योगपति जमनालाल बजाज ने

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Jamnalal-Bajaj

भारतीय उद्योगपति, समाज सेवी और स्वतंत्रता सेनानी जमनालाल बजाज की 11 फरवरी को 78वीं डेथ एनिवर्सरी हैं। वह महात्मा गांधी के पांचवें पुत्र के ​रूप में प्रसिद्ध थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने देश के क्रांतिकारियों को आर्थिक सहयोग दिया था। उन्होंने जातिगत भेदभाव का विरोध किया और हरिजनों के उत्थान के लिए कई उल्लेखनीय कार्य भी किए। उन्होंने ने 1920 के दशक में बजाज समूह की कंपनियों की स्थापना की और आज इस समूह की 24 कंपनियां हैं। इनमें से छह रजिस्टर्ड हैं।

जीवन परिचय

जमनालाल बजाज का जन्म 4 नवंबर, 1884 को राजस्थान के सीकर जिले के काशी का बास में हुआ था। उनके पिता कनीराम और माता बिरदीबाई थे। उनके पिता गरीब किसान थे। उन्हें छोटी उम्र में ही वर्धा के एक सेठ बच्छराज ने गोद ले लिया था। उन्हें पैसों की खनक मोहित न कर सकी और उनका झुकाव हमेशा देश सेवा में रहा। उनका विवाह जानकी देवी से वर्धा में हुआ।

देश की आजादी की ओर झुकाव

पहले विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार को आर्थिक सहयोग देने पर उन्हें मानद मजिस्ट्रेट नियुक्त किया। जब उन्होंने युद्ध कोष में धन दिया तो उन्हें ‘राय बहादुर’ की उपाधि से सम्मानित किया। लेकिन जब वर्ष 1921 में असहयोग आंदोलन चल रहा था तो उन्होंने इस उपाधि को वापस अंग्रेजी सरकार को लौटा दी थी।

गांधी के अनुयायी बने

जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तो जमनालाल की मुलाकात उनसे हुई। वह गांधीजी से काफी प्रभावित हुए। वह भी गरीबों के प्रति सेवा भाव में रुचि लेने लगे। वह गांधीजी के सादगीपूर्ण जीवन से काफी प्रभावित हुए। वह भी देश की आजादी और समाज सेवा में लग गए।

राष्ट्रीय आंदोलन में सहयोग

जमनालाल को वर्ष 1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन की स्वागत समिति का अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने गांधीजी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन में भाग लिया और राय बहादुर की उपाधि का वापस लौटा दिया। बाद में वर्ष 1923 में उन्होंने झंडा सत्याग्रह में भाग लिया। नागपुर में राष्ट्रीय ध्वज फहराने पर प्रतिबंध होने के बावजूद उन्होंने इसमें भाग लिया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

उन्होंने अप्रैल, 1930 में दांडी मार्च में भाग लिया और नमक सत्याग्रह में शामिल हो गए। जमनालाल को गांधी सेवा संघ के अध्यक्ष बनाया गया, रचनात्मक कार्यों के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उन्हें 1933 में कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य और कांग्रेस के कोषाध्यक्ष के रूप में चुना गया।

जमनालाल बजाज ने देश की आजादी के लिए उल्लेखनीय योगदान दिया था। वर्ष 1931 में उनके प्रयासों से ‘जयपुर राज्य प्रजा मंडल’ की स्थापना में योगदान दिया। लेकिन जयपुर राज्य ने 30 मार्च, 1938 को इस पर रोक लगा दी।

सामाजिक कार्य

जमनालाल बजाज ने अस्पृश्यता को दूर करने, हिंदी को बढ़ावा देने और खादी और ग्रामोद्योग जैसे कार्यों में अपनी रुचि दिखाई। उन्होंने खादी को बढ़ावा देने के लिए देश भर में दौरा किया था। 1925 में उन्हें ऑल इंडिया स्पिनर्स एसोसिएशन के कोषाध्यक्ष के रूप में चुना गया। उन्हें अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने सभी भारतीयों को एकजुट करने के लिए हिंदी को एकल भाषा के रूप में बढ़ावा दिया। हिंदी पत्रिकाओं और पुस्तकों के प्रकाशन में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने सी राजगोपालाचारी के साथ दक्षिण भारत में हिंदी के प्रसार के लिए हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की और देश में हिंदी के प्रचार-प्रसार की आशा की।

उन्होंने अस्पृश्यता के उन्मूलन के करने के लिए वर्ष 1928 में हरिजनों के लिए वर्धा में अपने स्वयं के पारिवारिक मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर खोले। उन्होंने हरिजनों के साथ भोजन करके और उनके लिए सार्वजनिक कुएं का निर्माण करवाया। उनके सामाजिक कार्यों केा सम्मान देने के लिए वर्ष 1978 में ‘जमनालाल बजाज पुरस्कार’ बजाज फाउंडेशन द्वारा स्थापित किया गया है। उनके नाम पर कई संस्थानों के नाम रखे गए हैं, जिनमें जमनालाल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज भी शामिल है। मुंबई के उप-शहरी अंधेरी में एक इलाके जेबी नगर का नाम उनके नाम पर रखा गया है।

निधन

जमनालाल बजाज का वर्धा में 11 फरवरी, 1942 को मस्तिष्क की नस फट जाने की वजह से निधन हो गया।

 

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