शैलेन्द्र : वो गीतकार जो जुहू बीच पर मॉर्निंग वॉक करते समय लिखता था गीत

Views : 984  |  0 minutes read

जी करता है जीते जी, मैं यूं ही गाता जाऊं

गर्दिश में थके हारों का, माथा सहलाता जाऊं

फिर इक दिन तुम दोहराओ. मैं गाऊं तुम सो जाओ, सुख सपनों में खो जाओ।

बॉलीवुड जगत के पिछले दो दशक से लगभग 170 फिल्मों में अपने गीतों के जरिए लोगों को जिंदगी का हर फलसफा समझाना और जिंदगी के हर रंग को दिखाने में माहिर गीतकार शैलेन्द्र की 14 दिसंबर को पुण्यतिथि है। शैलेन्द्र ने वो हर गीत लिखे जिसमें इंसान अपनी जिंदगी के हर पहलू को जोड़ सकता है। मुंबई के जुहू बीच पर सुबह की सैर के दौरान गीत लिखने वाला ये गीतकार जीवन की हर छोटी से छोटी बात अपने गीतों के जरिए समझाता था।

मुंबई में रेलवे की नौकरी से की शुरूआत

पश्चिमी पंजाब का रावलपिंडी शहर हुआ करता था जो आज के पाकिस्तान में बसा है वहां 30 अगस्त 1923 को शंकरदास केसरीलाल उर्फ शैलेन्द्र का जन्म हुआ जो अपने सभी भाइयों में सबसे बड़े थे। बचपन में माता पार्वतीदेवी की मौत से वो गहरे सदमे में चले गए और ईश्वर को मानना बंद कर दिया। साल 1947 शैलेन्द्र में करियर और काम की तलाश में मुंबई आए और रेलवे में नौकरी करने लगे।

सरकारी नौकरी तो करने लगे लेकिन मन उनका कविताओं में ही रहता। वो ऑफिस के समय काम कम और कविताएं लिखा करते थे। उनके इस रवैये के कारण उनके कई अधिकारी उनसे नाराज चलते थे। आखिरकार वो ऑफिस के साथ देश को आजादी कराने की लड़ाई में लग गए औऱ अपनी कविताओं के जरिए लोगों में जोश भरने लगे। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों उनकी कविता ‘जलता है पंजाब’ लोगों के बीच काफी पसंद की गई।

अभिनेता राजकपूर के पसंदीदा गीतकार

शैलेन्द्र शुरूआत से आजादी से जुड़े गीत औऱ कविताएं लिखा करते थे। एक कवि सम्मेलन में उनकी मुलाकात अभिनेता राजकपूर से हुई। राजकपूर को शैलेन्द्र का अंदाज काफी पसंद आया और उन्होंने शैलेन्द्र को फिल्मों में लिखने का ऑफर दिया।

फिर गीतकार के रूप में शैलेन्द्र ने अपना पहला गाना राजकपूर की साल 1949 में आई फिल्म ‘बरसात’ के लिए ‘बरसात में तुमसे मिले हम सजन’ लिखा। यह गाना लोगों को काफी पसंद आया औऱ इस गाने के बाद शैलेन्द्र और राजकपूर की मानो जोड़ी बन गई। दोनों ने इसके बाद ‘आवारा’, ‘आग’, ‘श्री 420’, ‘चोरी चोरी’ ‘अनाड़ी’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘संगम’, ‘तीसरी कसम’, ‘एराउंड द वर्ल्ड’, ‘दीवाना’, ‘सपनों का सौदागर’ और ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी फिल्मों में काम किया।

आखिरी समय एक वादा अधूरा रह गया

शैलेन्द्र ने फिल्मों में भी हाथ आजमाया और साल 1966 में ‘तीसरी कसम’ फिल्म बनाई जो बॉक्स ऑफिस पर बड़ी असफल साबित हुई जिसके बाद उन्हें गहरा सदमा लगा और उन्हें दिल का दौरा पड़ गया। 13 दिसंबर 1966 को अस्पताल जाने से पहले वो राजकपूर से मिले और उनकी आने वाली फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ का गीत ‘जीना यहां मरना यहां’ पूरा लिखने का वादा किया लेकिन ये वादा सिर्फ एक वादा ही रह गया। अगले दिन 14 दिसंबर 1966 को उनका निधन हो गया।

COMMENT