सरकारी नौकरी के लिए आत्महत्या करने वाले नौजवानों से मुझे कई शिकायतें हैं !

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हम रोज कहीं ना कहीं सुनते हैं कि हमारी सभ्यता किस ओर जा रही है , हम कौनसे समाज में जी रहे हैं, हमारा युवा दिशाहीन होता जा रहा है…लेकिन हम सिर्फ सवाल पर सवाल करना पसंद करते हैं पर उन सवालों का जवाब ढूंढने की हमारी कोशिश सिर्फ खुद से किया जाने वाला एक धोखा है, क्योंकि हम कोशिश करने का सिर्फ ढोंग करते हैं। हाल में अलवर के 4 नौजवानों ने रेल की पटरियों पर कूदकर जान दे दी, वजह सामने आई कि उन्हें लगता था कि सरकारी नौकरी तो लगनी नहीं है, जीने का फिर क्या फायदा ?

अब देखिए फिर एक घटना ने हमें आज झकझोर दिया, और फिर हम सोचने पर मजबूर हो गए। आने वाले 2 से 3 दिन फिर हम समाज की बातें करेंगे, दिशाहीन और भटके हुए युवा पर चिंतन करेंगे और फिर सबकुछ भूल जाएंगे क्योंकि हमें यही करना आता है, हम किसी को मोटिवेशन नहीं दे सकते हैं लेकिन हम किसी को नेगेटिविटी से जरूर भर सकते हैं।

आपको लग रहा होगा कि मैं सरकारी तंत्र की बात क्यों नहीं कर रहा, हां मैं सरकारी की नाकाम योजनाओं की बात आज नहीं करूंगा, क्योंकि उनकी नाकाम योजनाओं के लिए ही सही पर एक मानसिक रूप से तैयार युवा तो होना चाहिए।

सरकारी नौकरी बड़ी या जिंदगी ?

जिन 4 नौजवानों ने आत्महत्या की है, उनका यह सोचना था कि सरकारी नौकरी के बिना आगे की जिंदगी गुजारने का कोई मतलब नहीं है। अब समाज को कटघरे में रखकर सोचिए हमनें कैसा माहौल हमारे युवा वर्ग को तैयार करके दिया है, जहां वो अपनी जिंदगी की प्रमाणिकता सिर्फ सरकारी नौकरी में ही खोज रहा है, जहां उसके पढ़-लिख कर जीने का मतलब ही सरकारी नौकरी है। हमने इन युवा दिमागों में इस तरह से विकृतियां भर दी है कि उसे लगता है कि अगर सरकारी नौकरी नहीं की तो कुछ नहीं किया, फिर उसे सरकारी नौकरी हासिल ना होने पर उसकी कीमत जान देकर चुकानी पड़ती है।

माता-पिता का रोल है अहम

किसी भी युवा दिमाग पर उसके समाज की छाया पड़ने से पहले वो माता-पिता से होकर गुजरता है। माता-पिता की भूमिका इसलिए अहम हो जाती है क्योंकि हर माता-पिता को आज सफल जिंदगी बनाने का आधार सिर्फ सरकारी नौकरी ही दिखाई देता है। उनकी महत्वकांक्षाएं अगर उनकी औलाद पर भारी पड़ रही है तो उन्हें इस बात का अंदाजा सबसे पहले होना चाहिए।

समाज का दोगलापन  

किसी भी युवा की जिंदगी में उसके समाज का रोल काफी अहम माना जाता है। आज का युवा जो समाज देख रहा है वो बहुत दोगला है। एक तरफ वो कहता है कि तुम युवा हो, तुम्हारी अभी पूरी जिंदगी पड़ी है, जो मर्जी हों वो करो, दूसरी तरफ यही समाज सरकारी नौकरी के लिए कोचिंग भेजना कितना जरूरी है यह ना जाने कितने ही माता-पिता को बताता है। ऐसे दोगले समाज से होने वाला खामियाजा भी उस युवा को ही भुगतना होता है, जो इस भागमभाग में अकेला भाग रहा है।

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