गोविंद बल्लभ पंत: भारतीय स्वतंत्रता सेनानी जो उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री चुने गए

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भारत की आजादी में योगदान देने वाले स्वतंत्रता सेनानी और उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री भारत रत्न पंडित गोविन्द बल्लभ पंत की आज 10 सिंतबर को 132वीं जयंती है। पंत भारत के गृहमंत्री पद पर रहे थे और इन्होंने भारत में भाषा के अनुसार राज्यों का विभाजन करने में बड़ा योगदान दिया।

जीवन परिचय

गोविन्द बल्लभ पंत का जन्म 10 सितंबर, 1887 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के खूंट गांव में हुआ था। उनके पिता मनोरथ पंत और माता गोविंदी थी। पंत का परिवार महाराष्ट्रियन मूल से संबंध रखता था। पिता की सरकारी नौकरी थी। इनके पिता की मृत्यु बचपन में ही हो गई। उनकी परवरिश नाना बद्रीदत्त जोशी के यहां हुई। गोविंद के व्यक्तित्व और राजनीतिक विचारों पर उनके नाना का गहरा प्रभाव पड़ा था।

प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद गोविंद वर्ष 1905 में आगे की पढ़ाई करने के लिए अल्मोड़ा से इलाहाबाद आ गए। उन्होंने वर्ष 1909 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की। वह पढ़ाई में होशियार थे और हर साल सर्वाधिक अंकों से उत्तीर्ण होते थे इसलिए उन्हें कॉलेज की ओर से ‘लैम्सडेन अवॉर्ड’ से पुरस्कृत किया गया। उन्होंने काशीपुर में वकालत प्रारंभ कर दी थी। अध्ययन के दौरान वह राष्ट्रीय कांग्रेस के संपर्क में आए थे। उन्होंने काकोरी कांड में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान और अन्य क्रांतिकारियों के मुकदमे की पैरवी की थी।

पंत की पहली पत्नी गंगादेवी और पहले बेटे की मौत हो गई थी। तब उन्होंने वकालत भी शुरू नहीं की थी। वर्ष 1912 में परिवार वालों के दबाव डालने पर उन्होंने दूसरा विवाह किया। दूसरी पत्नी से एक बेटा हुआ। परंतु उसकी भी बीमारी के कारण मौत हो गई और वर्ष 1914 में उनकी दूसरी पत्नी भी स्वर्ग सिधार गईं। फिर 1916 में 30 की उम्र में उनका तीसरा विवाह कलादेवी से हुआ।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान

गोविंद बल्लभ पंत ने रोलेक्ट एक्ट के विरोध में जब महात्मा गांधी ने वर्ष 1920 में असहयोग आंदोलन शुरू किया तो उन्होंने आंदोलन में भाग लिया। यहीं से वर्ष 1921 में उन्होंने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया। आगरा और अवध के संयुक्त प्रांत के विधान सभा के लिए चुने गए। उन्होंने वर्ष 1930 में नमक सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया, जिसके चलते उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

जब वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो पंत को भी गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। मार्च 1945 तक वह कांग्रेस कमिटी के अन्य सदस्यों के साथ अहमदनगर किले में तीन वर्ष तक कैद रहे। कैद के दौरान उनका स्वास्थ्य भी दिनोंदिन गिरता जा रहा था, जिसे देखते हुए जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें रिहा करने की अपील की।

मुख्यमंत्री का सफर

ब्रिटिश भारत में गोविंद बल्लभ पंत को संयुक्त प्रांत यानि उत्तर प्रदेश विधानमंडल के हुए चुनावों में जुलाई, 1937 से लेकर नवम्बर, 1939 तक मुख्यमंत्री चुना गया। वह उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री चुने गए। जब देश आजाद हुआ तो उसके बाद पंत उत्तर प्रदेश के वर्ष 1954 तक मुख्यमंत्री रहे।

पंत ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए जमींदारी व्यवस्था का उन्मूलन किया। इसके अलावा उन्होंने हिंदू कोड बिल पारित किया और हिंदू पुरुषों के लिए एकाधिकार अनिवार्य कर दिया। हिंदू महिलाओं को पैतृक संपत्ति के लिए तलाक और विरासत का अधिकार दिया।

सरदार वल्लभ भाई पटेल की मृत्यु होने के बाद उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में गृहमंत्री चुना गया। वह वर्ष 1955 से 1961 तक गृहमंत्री के पद पर रहे।

एक स्वतंत्रता सेनानी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के रूप में अपनी निस्वार्थ सेवा के लिए उन्हें 1957 में देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

निधन

गोविंद बल्लभ पंत का 7 मार्च, 1961 में 74 साल की उम्र में निधन हो गया।

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