घनश्याम दास बिड़ला: आजादी में अमूल्य योगदान देने वाले उद्योगपति गांधीजी के रहे थे करीबी

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भारत के एक ऐसे अग्रणी उद्योगपति जिन्होंने भारत की आजादी में अपना अमूल्य योगदान दिया था और देश के पूंजीपतियों से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन करने की अपील की थी। जीडी बिड़ला महात्मा गांधीजी के मित्र के साथ ही उनके सलाहकार, प्रशंसक एवं सहयोगी थे। घनश्याम दास भारत के प्रमुख औद्योगिक समूह बी. के. के. एम. बिड़ला समूह के संस्थापक थे, इस समूह की कुल परिसंपत्तियाँ 195 अरब रुपये से अधिक है।

बिड़ला समूह का मुख्य व्यवसाय कपड़ा, बिस्कुट, फ़िलामेंट यार्न, सीमेंट, रासायनिक पदार्थ, बिजली, उर्वरक, दूरसंचार, वित्तीय सेवा और एल्युमिनियम क्षेत्र में है, जबकि अग्रणी कंपनियाँ ‘ग्रासिम इंडस्ट्रीज’ और ‘सेंचुरी टेक्सटाइल’ हैं। भारत सरकार ने उनको उनके देशहित में किए गए उल्लेखनीय कार्यों के लिए 1957 में पद्म विभूषण की उपाधि से सम्मानित किया। ऐसे देशभक्त और उद्योगपति घनश्याम दास बिड़ला की 11 जून को 38वीं पुण्यतिथि है। इस ख़ास मौके पर जानते हैं उनके जीवन के बारे में…

घनश्याम दास बिड़ला का जीवन परिचय

घनश्याम दास बिड़ला का जन्म राजस्थान के झुंझुनूं जिले के पिलानी नामक स्थान पर 10 अप्रैल, 1894 ई. को हुआ था। वे एक मारवाड़ी परिवार से संबंध रखते हैं। उनके पिता बलदेवदास थे, जो व्यापार का करते ​थे। उनका विवाह सन 1905 में दुर्गा देवी के साथ हुआ। घनश्याम दास को हिन्दी और गणित का ज्ञान एक स्थानीय शिक्षक की मदद से मिला। अपने पिता बी. डी. बिड़ला की प्रेरणा व सहयोग से घनश्याम दास बिड़ला ने कलकत्ता में व्यापार जगत में प्रवेश किया।

बिड़ला परिवार की तरह ही उनके ससुर महादेव सोमानी भी व्यवसाय के लिए कोलकाता चले गए थे। उनके एक पुत्र हुआ जिसका नाम लक्ष्मी निवास रखा गया। दुर्गा देवी की टी.बी. के कारण 1910 में मृत्यु हो गयी। इस दुखद घटना से उभर कर सन 1912 में उन्होंने महेश्वरी देवी से दूसरा शादी कर ​ली और उनसे उनके पांच संताने (दो पुत्र कृष्ण कुमार और बसंत कुमार और तीन पुत्रियाँ चन्द्रकला देवी दागा, अनसुइया देवी तपुरिया और शांति देवी महेश्वरी) हुईं।

दुर्भाग्यवस महेश्वरी देवी को भी क्षय रोग (टी.बी.) हो गया, उनकी इलाज के बावजूद 6 जनवरी 1926 को देहांत हो गया। इस समय घनश्यामदास की उम्र 32 साल थी, पर उन्होंने दोबारा विवाह का ख्याल मन से निकाल दिया और अपने बच्चों का लालन-पालन के लिए अपने चार बच्चों को छोटे भाई ब्रिज मोहन बिड़ला के पास भेज दिया और दो पुत्रियों को अपने बड़े भाई रामेश्वर दास बिड़ला के पास भेजा।

व्यापार की शुरूआत में संघर्ष

घनश्याम दास बिड़ला ने 1912 में अपने ससुर एम. सोमानी के सहयोग से पटसन (जूट) की दलाली का व्यवसाय शुरू कर दिया। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान पटसन और कपास की भारी मांग के ​चलते जीडी बाबू ने खूब मुनाफा कमाया। उनकी इस कामयाबी से अंग्रेज व्यापारियों को जलन होती थी क्योंकि वे पटसन के व्यापार पर एकाधिकार जमा चुके थे और यूरोप के कारखानों को ऊंचे दामों पर पटसन बेचते थे। कोलकाता में ही 1918 में उन्होंने ‘बिड़ला ब्रदर्स’ की स्थापना की, उन्होंने यही पर पहली पटसन मिल की स्थापना की।

अंग्रेजों ने इसका तोड़ निकालने के लिए मुद्रा के विनिमयन को अपने हक में कर लिया, जिससे बिड़ला ने अंग्रेजों का विरोधस्वरूप ‘हिंदुस्तान के सोने और स्टर्लिंग की लूट’ की बात कहकर पूरे देश में आवाज उठाई। कई बार अंग्रेज कारोबारियों ने उनके व्यापार को बंद करवाने की कोशिशें की पर हर बार नाकाम रहे।

उन्होंने मध्यप्रदेश के ग्वालियर में 1921 में कपड़ा मिल की स्थापना की और 1923 से 1924 में उन्होंने केसोराम कॉटन मिल्स ख़रीद ली। जीडी बाबू 1928 ई. में भारत के पूंजीपतियों के संगठन ‘भारतीय वाणिज्य उद्योग महामण्डल’ के अध्यक्ष चुने गये।

वे जूट उद्योग तक ही सीमित नहीं रहे उन्होंने 1942 के दशक में ‘हिंदुस्तान मोटर्स’ की स्थापना और कार उद्योग में हाथ आजमाया। जब देश को आजादी मिली और अंग्रेज भारत छोड़कर जा रहे थे तब उन्होंने कई पूर्ववत यूरोपियन कंपनियों को खरीदकर चाय और टेक्सटाइल उद्योग में निवेश किया। उन्होंने कंपनी का विस्तार सीमेंट, रसायन, रेयान, स्टील पाइप जैसे क्षेत्रों में भी किया।

जब भारत में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ प्रगति पर था उस दौरान घनश्याम दास को एक ऐसा व्यावसायिक बैंक स्थापित करने की सूझी, जो पूरी तरह भारतीय पूँजी और प्रबंधन पर निर्भर हो। उनके इस विचार को कार्य रूप देने के लिए वर्ष 1943 में ‘यूनाइटेड कमर्शियल बैंक’ की स्थापना कोलकाता में की गयी। यह भारत के सबसे पुराने व्यावसायिक बैंकों में से एक है और इसका नाम अब यूको बैंक हो गया है।

भारतीय शिक्षा में दिया उल्लेखनीय योगदान

जहां घनश्याम दास बिड़ला ने भारत के उद्योग जगत को मजबूत किया साथ ही स्वतंत्रता आंदोलन में भी योगदान दिया। इसके साथ ही उन्होंने सन 1943 में अपनी जन्मस्थली पिलानी में ‘बिड़ला इंजीनियरिंग कॉलेज’ जिसका नाम 1964 में बदलकर ‘बिड़ला इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी एंड साइंस कर दिया गया और भिवानी में ‘टेक्नोलॉजिकल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्सटाइल एंड साइंसेज’ की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। ये दोनों संस्थान भारत के सर्वोच्च इंजीनियरिंग संस्थानों की श्रेणी में आते हैं।

यहीं पर ‘सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट’ की एक शाखा, एक आवासीय विद्यालय और कई पॉलिटेक्निक कॉलेज हैं। उनकी स्मृति में देश के बेहतर आवासीय विद्यालयों में शुमार ‘जी.डी. बिड़ला मेमोरियल स्कूल, रानीखेत’ स्थापित किया गया था।

भारत की आजादी के लिए संघर्ष और योगदान

भारत के उद्योगपति होने के बावजूद घनश्याम दास बिड़ला एक सच्चे देशभक्त बनकर भारत की आजादी में उल्लेखनीय योगदान दिया था। महात्मा गांधी को स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हर समय आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए तत्पर रहते थे। इस दौरान उन्होंने भारत के पूंजीपतियों से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में समर्थन करने एवं कांग्रेस के हाथ मज़बूत करने की अपील की। इन्होंने सविनय अवज्ञा आन्दोलन का समर्थन किया।

यहीं नहीं उन्हें सन 1926 में ब्रिटिश भारत में केन्द्रीय विधान सभा के लिए निर्वाचित किया गया। सन 1932 में घनश्याम दास ने महात्मा गाँधी के साथ मिलकर दिल्ली में ‘हरिजन सेवक संघ’ की स्थापना की और उनके उत्थान के लिए कार्य किया।

यही नहीं वे देश में मौजूदा सामाजिक कुरीतियों का भी विरोध करने में आगे रहे।

अपने जीवन में कई पुस्तकें लिखी थी जिनमें प्रमुख हैं-

रूपये की कहानी
बापू
जमनालाल बजाज
Paths to Prosperity
In the Shadow of the Mahatma

निधन

देश के लिए घनश्याम दास बिड़ला का हर योगदान हमेशा एक आदर्श पेश करता रहेगा जिन्होंने न केवल देश का उद्योग जगत में मजबूत बनाया, बल्कि देश की आजादी में भी योगदान दिया। ऐसे कर्मवीर की 11 जून, 1983 को मुंबई मृत्यु हो गई।

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