देवकीनंदन खत्री की तिलस्मी उपन्यास परंपरा को और अधिक सूक्ष्मता से आगे बढ़ाया था दुर्गा प्रसाद खत्री ने

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हिन्दी के मशहूर तिलिस्मी उपन्यासकार देवकीनंदन खत्री के बेटे और उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने वाले उपन्यासकार दुर्गाप्रसाद खत्री की 5 अक्टूबर को 45वीं पुण्यतिथि हैं। उन्होंने अपने जीवन काल में अनेक कहानियां और उपन्यास लिखे। इन्होंने अपने पिता की तरह तिलस्मी एवं ऐय्यारी के अलावा जासूसी, सामाजिक और अद्भुत, किंतु संभावित घटनाओं पर आधारित उपन्यासों की रचना की। उनकी रचनाओं को आज भी पाठक बड़े चाव से पढ़ते हैं।

जीवन परिचय

दुर्गाप्रसाद का जन्म 12 जुलाई, 1895 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ था। इनके पिता प्रख्यात तिलस्मी उपन्यासकार देवकीनन्दन खत्री थे। वर्ष 1912 में उन्होंने विज्ञान और गणित में विशेष योग्यता के साथ स्कूल लीविंग परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने लेखन के क्षेत्र में अपना कॅरियर बनाया। इनके उपन्यास चार प्रकार के हैं- तिलस्मी एवं ऐय्यारी, जासूसी उपन्यास, सामाजिक और अद्भुत किन्तु संभाव्य घटनाओं पर आधारित उपन्यास।

दुर्गा प्रसाद ने तिलस्मी उपन्यास में अपने पिता की परंपरा का तो निवर्हन किया ही पर उसे बड़ी सूक्ष्मता के साथ आगे बढ़ाया। उनके जासूसी उपन्यासों पर आजादी के दौरान राष्ट्रीय भावना और क्रांतिकारी आंदोलन का प्रभाव दृष्टिगत होता है। सामाजिक उपन्यास प्रेम के अनैतिक रूप के दुष्परिणाम उद्घाटित करते हैं। दुर्गा प्रसाद के लेखन का महत्व इस संदर्भ में भी है कि उन्होंने जासूसी वातावरण में राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याओं को प्रस्तुत किया।

अपने पिता के उपन्यास ‘भूतनाथ’ को किया पूरा

प्रसिद्ध देवकीनन्दन खत्री ने अपने उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’ के एक पात्र को नायक बना कर ‘भूतनाथ’ उपन्यास को लिखना शुरू किया था, किन्तु असामायिक मृत्यु के कारण वह इस उपन्यास के केवल छह भाग ही पूरे कर पाए थे। बाद में दुर्गा प्रसाद ने बाकी शेष पन्द्रह भाग लिख कर इस उपन्यास को पूरा किया। ‘भूतनाथ’ भी कथावस्तु का अन्तिम खंड़ नहीं है। इसके अगले खंड के रूप में दुर्गा प्रसाद लिखित ‘रोहतास मठ’ (दो खंडों में) आता है।

दुर्गा प्रसाद लिखित रचनाएं

दुर्गा प्रसाद खत्री ने अपने लेखन काल में 1500 कहानियां, 31 उपन्यास व हास्य प्रधान लेख विधाओं से पाठकों तक अपने विचार पहुंचाए। दुर्गा प्रसाद ने ‘उपन्यास लहरी’ और ‘रणभेरी’ नामक पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया था।

इनके उपन्यास चार भागों में बांटा जाता है-

तिलस्मी ऐय्यारी उपन्यास

उनके द्वारा लिखित भूतनाथ और रोहतास मठ उनके इस विधा के प्रमुख उपन्यास हैं और इनमें उन्होंने अपने पिता की परंपरा को जीवित रखने का ही प्रयत्न नहीं किया है बल्कि उनकी शैली का इस सूक्ष्मता से अनुकरण किया है कि यदि नाम न बताया जाए तो सहसा यह कहना संभव नहीं कि ये उपन्यास देवकीनंदन खत्री ने नहीं बल्कि किसी दूसरे व्यक्ति ने लिखे हैं।

जासूसी उपन्यास

दुर्गा प्रसाद ने स्वतंत्रता काल में देश की आजादी की लड़ाई से प्रेरित होकर कई जासूसी उपन्यास लिखे। प्रतिशोध, लालपंजा, रक्तामंडल, सुफेद शैतान जासूसी उपन्यास होते हुए भी राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत हैं और भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को प्रतिबिंबित करते हैं। सुफेद शैतान में समस्त एशिया को मुक्त कराने की मौलिक उद्भावना की गई है। शुद्ध जासूसी उपन्यास हैं- सुवर्णरेखा, स्वर्गपुरी, सागर सम्राट् साकेत, कालाचोर आदि। इन उपन्यासों में उन्होंने विज्ञान के तथ्यों के साथ जासूसी कला को विकसित करने का प्रयास किया है।

सामाजिक उपन्यास

इस रूप में अकेला ‘कलंक कालिमा’ है जिसमें प्रेम के अनैतिक रूप को लेकर उसके दुष्परिणाम को उद्घाटित किया गया है। बलिदान को भी सामाजिक चरित्र प्रधान उपन्यास कहा जा सकता है किंतु उसमें जासूसी की प्रवृत्ति काफ़ी मात्रा में झलकती है।

संसार चक्र अद्भुत किंतु संभाव्य घटनाचक्र पर आधारित उपन्यास
माया उनकी कहानियों का एकमात्र संग्रह है। ये कहानियां सामाजिक नैतिक हैं। उनकी साहित्यिक महत्ता यह है कि उन्होंने देवकीनंदन खत्री और गोपालराम गहमरी की ऐय्यारी जासूसी-परंपरा को तो आगे बढ़ाया ही है, साथ ही सामाजिक और राष्ट्रीय समस्याओं को जासूसी वातावरण के साथ प्रस्तुत कर एक नई परंपरा को विकसित करने की चेष्टा की है।

निधन

दुर्गा प्रसाद खत्री का निधन 5 अक्टूबर, 1974 को हो गया।

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