डॉ. ज़ाकिर हुसैन ने राष्ट्रपति पद पर रहते हुए दुनिया को कहा था अलविदा

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देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी। इसके बाद वो महात्मा गांधी के साथ रहकर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने लगे थे। भारत के तीसरे राष्ट्रपति रहे डॉ. ज़ाकिर हुसैन को आधुनिक शिक्षा के समर्थकों में से एक माना जाता था। डॉ. ज़ाकिर को महज़ 29 साल की उम्र में ‘जामिया मिलिया इस्लामिया’ का वाइस चांसलर बनने का मौका मिला था। उन्हें ‘पद्म विभूषण’ और देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से भी नवाजा गया। 3 मई को पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन की 53वीं पुण्यतिथि है। इस मौके पर जानिए उनके जीवन के बारे में कुछ अहम बातें…

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महज 8 साल की उम्र में पिता को खोया

डॉ. ज़ाकिर हुसैन का जन्म 8 फरवरी 1897 को हैदराबाद, आंध्र प्रदेश में एक पठान परिवार में हुआ था। मात्र 8 साल की छोटी उम्र में ही ज़ाकिर के पिता का देहांत हो गया था। वे अपनी पढ़ाई के दौरान महात्मा गांधी से खासा प्रभावित हुए और पढ़ाई बीच में छोड़ आज़ादी की लड़ाई में कूद गए। देश की बुनियादी शिक्षा व्यवस्था को ठीक करने का काम गांधीजी ने जाकिर हुसैन को दिया था। इसके बाद वो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कुलपति बनाए गए।

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वर्ष 1956 में वे राज्यसभा सदस्य के तौर पर चुने गए। इसके अगले साल ही डॉ. जाकिर बिहार राज्य के राज्यपाल नियुक्त किए गए। वे इस पद पर वर्ष 1962 तक रहे। इसी वर्ष डॉ. जाकिर हुसैन भारत के दूसरे उप-राष्ट्रपति चुने गए और वर्ष 1967 तक इस पद पर रहे। इसके बाद उन्हें कांग्रेस ने राष्ट्रपति देश के तीसरे राष्ट्रपति के चुनाव के लिए अपना उम्मीदवार घोषित किया।

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जब जामा मस्जिद से हुआ जीत का ऐलान

देश के साथ-साथ ख़ास तौर पर दिल्ली में डॉ. जाकिर हुसैन को काफी पसंद किया जाता था। जब वे राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ रहे थे तो नतीजे वाले दिन लोग राष्ट्रपति भवन के बाहर खड़े होकर इंतजार कर रहे थे। आखिरकार 6 मई, 1967 को ऑल इंडिया रेडियो पर जाकिर हुसैन की जीत का ऐलान किया गया और 13 मई, 1967 को उन्होंने देश के तीसरे और पहले मुस्लिम राष्ट्रपति के रूप में कार्यभार संभाला। डॉ. जाकिर की इस जीत का ऐलान दिल्ली की जामा मस्जिद से किया गया था। उनका निधन हार्ट अटैक से 3 मई, 1969 को राष्ट्रपति पद पर रहते हुए हुआ।

डॉ. जाकिर हुसैन ने प्लेटो की पुस्तक ‘रिपब्लिक’ तथा एडविन कैनन की पुस्तक ‘इलिमेट्री पॉलिटिकल इकोनॉमी’ का अनुवाद किया। उन्होंने जर्मन भाषा में ‘डाई बोट्स चाफ्ट्डेस महात्मा गांधी’ पुस्तक लिखीं।

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