डॉ. विक्रम साराभाई की भारत को अंतरिक्ष के क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाने में रही अहम भूमिका

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Vikram-Sarabhai-Biography

पूरा देश आज भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई की 101वीं जयंती मना रहा है। डॉ. साराभाई के उल्लेखनीय योगदान से ही भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में दिनों-दिन नई ऊंचाइयां छू रहा है। डॉ. विक्रम साराभाई को उनके योगदान के लिए वर्ष 1962 में ‘शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार’, वर्ष 1966 में ‘पद्म भूषण’ और वर्ष 1972 में ‘पद्म विभूषण (मरणोपरांत)’ से सम्मानित किया गया था। ऐसे में भारत के इस महान वैज्ञानिक की जन्म जयंती पर जानते हैं उनके जीवन के बारे में कुछ ख़ास बातें..

वर्ष 1947 में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना की

डॉ. विक्रम साराभाई का पूरा नाम विक्रम अंबालाल साराभाई था। उनका जन्म 12 अगस्त, 1919 को गुजरात के अहमदाबाद में हुआ था। उनके पिता अंबालाल साराभाई एक उद्योगपति थे और उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उल्लेखनीय योगदान दिया था। उनकी गुजरात में कई मीलें थीं। उन्होंने अपने माता-पिता की प्रेरणा से बचपन में ही तय कर लिया था कि उन्हें विज्ञान के माध्यम से देश और मानवता की सेवा करनी है।

डॉ. विक्रम साराभाई स्नातक की शिक्षा हासिल करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए प्रसिद्ध केम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गए थे। वहीं से उन्होंने सेंट जॉन कॉलेज से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। वहां से लौटने के बाद साराभाई ने वर्ष 1947 में अहमदाबाद में ही भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) की स्थापना की। डॉ. साराभाई ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने हमेशा युवा वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित किया और उन्हें आगे बढ़ने में मदद करते थे।

यूं चला इसरो के गठन का सफर

देश की आजादी के बाद उन्होंने वर्ष 1947 में फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी (पीआरएल) की स्थापना की, जिसे अहमदाबाद स्थित अपने ही घर में शुरु किया था। यहीं पर भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर काम शुरु किया। वर्ष 1952 में उनके संरक्षक डॉ.सी.वी. रमन ने पीआरएल के लिए एक नए भवन की बुनियाद रखी। उनकी कोशिशों का ही परिणाम है कि आज हमारे देश के पास भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ (इसरो) जैसी विश्व स्तरीय संस्था है।

उन्होंने कर्णावती (अमदाबाद) के डाइकेनाल और त्रिवेन्द्रम स्थित अनुसन्धान केन्द्रों में काम किया। डॉ. साराभाई ने भारत को अंतरिक्ष के क्षेत्र में निर्भर बनाने का कार्य शुरू कर दिया था क्योंकि उनकी रुचि अंतरिक्ष के क्षेत्र में अधिक थी। इसके लिए उन्होंने त्रिवेन्द्रम के पास थुम्बा और श्री हरिकोटा में रॉकेट प्रक्षेपण केन्द्र स्थापित किए। होमी भाभा की मदद से तिरुवनंतपुरम में देश का पहला रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन बनाया गया।

डॉ. साराभाई ने अपने परिवार के अनेक व्यापारिक समूहों का नेतृत्व किया। उनकी रुचि विज्ञान के साथ अन्य क्षेत्रों में भी थी। उन्होंने अनेक संस्थानों की स्थापना भी की। ऑपरेशन रिसर्च ग्रुप (ओआरजी) की स्थापना की, जो देश का पहला बाजार अनुसंधान संगठन है। उन्होंने कई संस्थानों की मदद की, जैसे अहमदाबाद में नेहरू फाउंडेशन फॉर डेवलपमेंट, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद (IIMA), अहमदाबाद टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज़ रिसर्च एसोसिएशन (ATIRA) और (CEPT) प्रमुख हैं। उन्होंने अपनी पत्नी मृणालिनी साराभाई के सहयोग से दर्पण अकादमी ऑफ़ परफॉर्मिंग आर्ट्स की स्थापना की। उनके द्वारा शुरू की गई या स्थापित की गई अन्य परियोजनाओं और संस्थानों में कलकत्ता में फास्टर ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर) शामिल हैं।

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निधन

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को दुनियाभर में बुलंदियों पर पहुंचाने वाले देश के इस महान वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई का 30 दिसंबर, 1971 को केरल के तिरुवनंतपुरम स्थित कोवलम में निधन हो गया था।

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