कलकत्ता विश्वविद्यालय में सबसे कम उम्र में वाईस चांसलर बने थे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी

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भारतीय शिक्षाविद्, चिन्तक, राजनेता और भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आज 6 जुलाई को 118वीं जयंती है। उन्हें एक प्रखर राष्ट्रवादी के रूप में जाना जाता है। उन्होंने पंडित जवाहर लाल नेहरु मंत्रिमंडल में उद्योग और आपूर्ति मंत्री के पद पर रहे। लेकिन जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर नेहरु के साथ मतभेद के कारण मंत्रिमंडल से त्याग पत्र दे दिया और एक अलग पार्टी ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना की, यही पार्टी आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी बनी। मुखर्जी ने अनुच्छेद 370 का कड़ा विरोध किया और इसे देश की एकता के लिए खतरा मानते हुए संसद के अंदर और बाहर इसके खिलाफ संघर्ष करते रहे। डॉ. मुखर्जी मात्र 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय के वाईस चांसलर बन गए थे। इस पद पर नियुक्ति पाने वाले वह सबसे कम आयु के व्यक्ति थे।

प्रारंभिक जीवन

डॉ. श्यामा प्रसाद मुख़र्जी का जन्म 6 जुलाई, 1901 को कलकत्ता के एक समृद्ध परिवार में हुआ। उनके पिता आशुतोष मुखर्जी थे जो कलकत्ता स्थित उच्च न्यायालय में न्यायाधीश थे। वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के उप-कुलपति भी थे। उनकी माता का नाम जोगमाया देवी था। उन्होंने वर्ष 1914 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर की और प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया। उन्होंने वर्ष 1916 में आर्ट्स में इंटर परीक्षा पास की। वर्ष 1921 में अंग्रेजी विषय में प्रथम श्रेणी में पहला स्थान के साथ स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने बंगाली विषय में एम.ए. भी प्रथम स्थान के साथ उत्तीर्ण किया।

इनका विवाह 16 अप्रैल, 1922 को सुधा देवी के साथ हुआ। इनके दो बेटे और दो बेटियां हुई। उनकी पत्नी का देहांत वर्ष 1933 में हो गया, जिसके बाद उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया और अपना जीवन राष्ट्र हित में समर्पित कर दिया।

कॅरियर

वर्ष 1924 में पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट में वकालत के लिए पंजीकरण कराया और दो वर्ष वकालत करने के बाद वर्ष 1926 में वह कानून की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड चले गए और 1927 में बैरिस्टर बन कर वापस भारत आ गए। इसी वर्ष उन्हें अंग्रेजी बार में आमंत्रित किया गया। वर्ष 1934 में 33 वर्ष की आयु में वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे कम उम्र में वाईस चांसलर बने और उन्होंने इस पद पर वर्ष 1938 तक कार्य किया। वर्ष 1937 में उन्होंने गुरु रविंद्रनाथ टैगोर को कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भाषण के लिए आमंत्रित किया। कलकत्ता विश्वविद्यालय के इतिहास में यह पहला अवसर था जब किसी ने दीक्षांत समारोह का भाषण बांग्ला में दिया हो।

राजनीतिक कॅरियर

डॉ. मुख़र्जी के राजनैतिक जीवन की शुरुआत वर्ष 1929 में हुई जब उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य के रूप में बंगाल विधान परिषद् में प्रवेश किया, परन्तु जब कांग्रेस ने विधान परिषद के बहिष्कार का निर्णय लिया तब उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इसके पश्चात उन्होंने स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और वह चुने गए। वर्ष 1941-42 में वह बंगाल राज्य के वित्त मंत्री रहे। वर्ष 1937 से 1941 के बीच जब कृषक प्रजा पार्टी और मुस्लिम लीग की साझा सरकार थी तब वह विपक्ष के नेता थे और जब फजल उल हक़ के नेतृत्व में एक प्रगतिशील सरकार बनी तब उन्होंने वित्त मंत्री के तौर पर कार्य किया पर एक वर्ष बाद ही इस्तीफ़ा दे दिया। इसके बाद धीरे-धीरे वो हिन्दुओं के हित की बात करने लगे और हिन्दू महासभा में शामिल हो गए। वर्ष 1944 में वह हिन्दू महासभा के अध्यक्ष भी रहे।

डॉ. मुखर्जी धर्म के आधार पर भारत के विभाजन के कट्टर विरोधी थे। उनके अनुसार विभाजन सम्बन्धी परिस्थिति ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से उत्पन्न हुई थी। वह यह भी मानते थे कि सत्य यह है कि हम सब एक हैं और हममें कोई अन्तर नहीं है। हम सब एक ही भाषा और संस्कृति के हैं और एक ही हमारी विरासत है। इस मान्यता के साथ आरम्भ में उन्होंने देश के विभाजन का विरोध किया था पर 1946-47 के दंगों के बाद उनके इस सोच में परिवर्तन आया। उन्होंने महसूस किया कि मुस्लिम लीग के सरकार में मुस्लिम बाहुल्य राज्य में हिन्दुओं का रहना असुरक्षित होगा। इसी कारण वर्ष 1946 में उन्होंने बंगाल विभाजन का समर्थन किया।

स्वतंत्रता के बाद जब पंडित जवाहरलाल नेहरु के नेतृत्व में सरकार बनी तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुख़र्जी भारत के पहले मंत्रिमण्डल में शामिल हुए और उद्योग और आपूर्ति मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली। भारत के संविधान सभा और प्रान्तीय संसद के सदस्य और केन्द्रीय मन्त्री के तौर पर उन्होंने अपना विशिष्ट स्थान बना लिया परन्तु उनके राष्ट्रवादी सोच के चलते कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ मतभेद बराबर बने रहे। अंततः सन 1950 में नेहरु-लियाकत समझौते के विरोध में उन्होंने 6 अप्रैल 1950 को मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया।

इसके बाद उन्होंने एक नए राजनैतिक दल की स्थापना अक्टूबर, 1951 में ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना की। वर्ष 1952 के चुनाव में भारतीय जन संघ ने कुल तीन सीटें जीती, जिसमे एक उनकी खुद की सीट शामिल थी।

धारा 370 का शुरू से किया विरोध

डॉ. मुखर्जी जम्मू-कश्मीर राज्य को एक अलग दर्जा दिए जाने के घोर विरोधी थे और चाहते थे कि जम्मू-कश्मीर को भी भारत के अन्य राज्यों की तरह माना जाए। वह जम्मू-कश्मीर के अलग झंडे, अलग निशान और अलग संविधान के विरोधी थे। उन्होंने देश की संसद में धारा-370 को समाप्त करने की जोरदार वकालत की।

अगस्त, 1952 में उन्होंने बिना परमिट लिए जम्मू-कश्मीर में प्रवेश का एलान किया और इसे पूरा करने के लिए वह वर्ष 1953 में बिना परमिट के जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहां पहुंचते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 23 जून, 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई।

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