नाथूराम गोडसे और RSS के क्या सबंध थे?

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आज ही के दिन यानि 15 नवंबर को महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को फांसी की सजा दी गई थी। उसने ऐसा क्यों किया कैसे किया ये वो सवाल हैं जिन पर कोर्ट और लोग, सभी ने बहुत स्याही खर्च की है।

एक सवाल जो हमेशा इतिहासकारों और सभी लेखकों के मन में रहता है और शायद आम जनता भी इससे इत्तेफाक रखती होगी कि क्या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का गांधीजी की हत्या में हाथ था? खैर इस पर फैसला सुनाना कोर्ट का ही काम है। लेकिन एक इतिहासकार गांधी की हत्या के पीछे छिपे विचार को समझने में दिलचस्पी रखता है।

नाथूराम और RSS में क्या संबंध थे इसके लिए किसी भी तरह की रसीद पेश नहीं की जा सकती। 1947-48 में वो संघ की शाखा में जाया करता था इसका भी किसी तरह का रजिस्ट्रेशन मिलना लगभग नामुमकिन—सा है।

लेकिन कुछ चीजें ऐसी हैं जिनसे RSS मुंह नहीं चुरा सकता। इस पर जो बात नाथूराम गोडसे के भाई ने कही वो ध्यान देने योग्य है। गोपाल गोडसे का कहना था कि ‘आप कह सकते हैं आरएसएस ने कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया था कि जाओ और गांधी को मार दो लेकिन आप उससे खुद को अलग नहीं कर सकते।’

सोशल मीडिया पर कई तरह के नामों से गांधी विरोधी पोस्टें और फर्जी खबरों को सर्कुलेट किया जाता है। ऐसे में ये सवाल जरूर उठता है कि ये लोग कौन हैं? ऐसा करने वाले लोग किसी न किसी तरह से RSS की कट्टर विचारधारा से जुड़े हुए मिलते हैं।

अब बात करते हैं RSS के रवैये की जो कि हत्या के पहले और बाद में अचानक से बदल से गए। गांधी जी की हत्या से पहले गोलवलकर ने स्वयंसेवकों के सामने कहा था कि ‘संघ पाकिस्तान को मिटाने तक चैन से नहीं बैठेगा। अगर कोई हमारी राह में आया तो हमें उसको भी मिटा देना होगा चाहे वो नेहरू सरकार हो आ और कोई। महात्मा गांधी उनको अब और गुमराह नहीं कर सकते। हमारे पास तरीके हैं जिनसे ऐसे लोगों को तत्काल प्रभाव से चुप कराया जा सकता है। लेकिन हमारी यह परंपरा नहीं है कि हम हिंदुओं के प्रति बैर भाव रखें। अगर हमें मजबूर किया गया तो हमें यह रास्ता भी अपनाना पड़ेगा’

गांधी जी की मौत के बाद सरदार पटेल के गुस्से पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।  उस समय के गृह मंत्री सरदार पटेल ने गोलवलकर को एक चिट्ठी लिखी जिसमें लिखा था ‘उनके (संघियों के) सभी भाषण सांप्रदायिक जहर से भरे थे। इस जहर के परिणामस्वरुप देश को गांधीजी के प्राणों की क्षति उठानी पड़ी।’ पटेल ने आगे कहा कि ‘आरएसएस के लोगों ने गांधीजी की मृत्यु के बाद खुशी जाहिर की और मिठाइयां बांटीं’

अगर माना जाए कि गांधी जी की मौत और RSS में किसी तरह का कोई संबंध नहीं है तो सार्वजनिक रूप से स्वयंसेवक संगठन को अपने भड़काऊ भाषणों की निंदा करनी चाहिए।

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