विशेष: टेलीविजन की ऐतिहासिक ‘रामायण’ के रचयिता रामानंद सागर ने बड़े संघर्ष के बाद पाया था मुकाम

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1987 में जब टेलीविजन पर ‘रामायण’ धारावाहिक की शुरुआत हुई तो पूरे देश में जैसे एक नया दौर शुरू हो गया। जब ‘रामायण’ का प्रसारण होता था तो पूरा हिन्दुस्तान रुक जाता था। जिनके घर में टीवी नहीं थी, वे आस-पड़ोस में जाकर इस शो को देखते थे। रामायण को देखने के लिए सभी धर्मों के लोगों में काफी उत्साह था, लेकिन क्या आप जानते हैं कि रामायण सीरियल को इतना प्रभावशाली बनाने के पीछे कौन है? हम आपको टेलीविजन की रामायण के रचयिता चंद्रमौलि चोपड़ा के बारे में बता रहे हैं, जिन्हें पूरी दुनिया रामानंद सागर के नाम से जानती है।

29 दिसंबर 1917 को जन्मे रामानंद सागर की नानी उन्‍हें गोद लेकर पेशावर से कश्‍मीर ले आई थीं। ऐसा भी कहा जाता है कि मुंबई आने से पहले उन्‍होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से संस्‍कृत और पर्शियन में डिग्री हासिल की और उन्हें गोल्‍ड मेडल भी मिला था। कहा जाता है कि कोई भी बड़ी सफलता कड़ा परिश्रम और त्याग मांगती है, ऐसा ही रामानंद के जीवन में भी हुआ। उन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया। उन्होंने अपनी जीविका चलाने के लिए ट्रक क्‍लीनर, चपरासी, क्‍लर्क, साबुन बेचने से लेकर दुकान पर हेल्परी तक का काम किया।

छोटे-मोटे काम करने के बाद उनके जीवन में नया मोड़ तब आया, जब उन्होंने समाचार-पत्र में काम करना शुरू किया। धीरे-धीरे अपने कार्य की कुशलता के कारण उन्हें समाचार-पत्र के संपादक के तौर पर भी चुना गया। इसके बाद उन्होंने कई उपन्‍यास, शॉर्ट स्‍टोरीज और कविताएं लिखी। इसी बीच वे टीबी से पीड़ित हो गए। वर्ष 1932 में उन्‍होंने पहली बार फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा। रामानंद ने अपना काम बतौर क्‍लैपर ब्‍वॉय शुरू किया। इसके बाद 1949 में वे मुंबई गए, जहां वे पृथ्‍वीराज कपूर के असिस्‍टेंट स्‍टेज मैनेजर बन गए।

पृथ्‍वीराज कपूर के साथ उन्होंने बहुत कुछ सीखा। इसके बाद ही उन्होंने फिल्‍म ‘बरसात’ की कहानी लिखी और इससे मशहूर हो गए। उन्होंने ऐतिहासिक धारावाहिक ‘रामायण’ का भी निर्माण किया, जिसे आज भी लोग नहीं भूल सकते हैं। इस शो ने उन्‍हें हर घर में पहचान दिलाई। आज भी उन्हें उनके इसी शो के लिए याद किया जाता है।

आज की पीढ़ी भी ‘रामायण’ की लोकप्रियता का अंदाज़ा इंटरनेट पर शेयर कई दिलचस्प कहानियों से लगा सकते हैं। उन्हीं दिलचस्प कहानियों में से एक कहानी है दुल्हन की, जो ‘रामायण’ के कारण शादी के मंडप में नहीं पहुंची थी। बाराती लंबे समय तक इंतज़ार करते रहे, जब इंतजार की हद हो गई तो कुछ लोगों ने पता करने की कोशिश की कि आखिर दुल्हन है कहां, तब पता चला कि दुल्हन ‘रामायण’ देख रही है। वह रोज़ रामायण देखती है।

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वहीं ऐसा भी कहा जाता है कि उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह रामायण के टेलीकास्ट के दौरान कोई फोन कॉल रिसीव नहीं करते थे। दो बड़े नेताओं के राष्ट्रपति भवन में शपथ समारोह में देरी से पहुंचने के पीछे भी रामायण का टेलीकास्ट ही था। ऐसे ही कई किस्से रामानंद की रामायण के दौरान हुए थे। रामायण के बाद रामानंद ने ‘विक्रम और बेताल’, ‘लवकुश’, ‘कृष्णा’, ‘अलिफ लैला’ और ‘साईं बाबा’ जैसे सीरियल भी बनाए। उन्हें भारत सरकार ने ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया। वे भले ही 2005 में इस दुनिया से चले गए हो, लेकिन आज भी उनकी यादें करोड़ों लोगों के दिलों में ताज़ा है।

 

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