जयंती: बिपिन चंद्र पाल ने परिवार के विरोध के बाद भी विधवा से किया था विवाह

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बिपिन चंद्र पाल गरम दल की प्रमुख तिकड़ी के सदस्य थे, जो लाल, बाल और पाल के नाम से प्रसिद्ध थे। तीनों ने भारत की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बिपिन चंद्र पाल की 7 नवंबर को 162वीं जयंती हैं। वह एक देशभक्त होने के साथ-साथ राजनीतिज्ञ, पत्रकार और प्रख्यात वक्ता भी थे।

बिपिन चंद्र पाल का जीवन परिचय

बिपिन चंद्र पाल का जन्म 7 नवंबर, 1858 को सिलहट के हबीबगंज जिले में (वर्तमान बांग्लादेश) एक संपन्न कायस्थ परिवार में हुआ था। उन्होंने ‘चर्च मिशन सोसाइटी कॉलेज’ (अब सेंट पॉल्स कैथेड्रल मिशन कॉलेज) में अध्ययन किया और बाद में पढ़ाया भी। यह कॉलेज कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था। वह ‘वंदे मातरम्’ नामक पत्रिका के संस्थापक और एक समाज सुधारक भी थे। उन्होंने समाज के सामने एक मिशाल कायम की और परिवार के विरोध के बावजूद एक विधवा से शादी कर ली थी।

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में योगदान

बिपिन चंद्र पाल ने वर्ष 1886 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। वर्ष 1887 में कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में उन्होंने अंग्रेजी सरकार द्वारा लागू किये गए ‘शस्त्र अधिनियम’ तत्काल हटाने की मांग की, क्योंकि यह अधिनियम भेदभावपूर्ण था। उन्होंने अरविंद घोष के साथ मिलकर एक ऐसे राष्ट्रवाद का प्रवर्तन किया, जिसके आदर्श पूर्ण स्वराज, स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा था। उन्होंने इन आदर्शों पर चलकर ही स्वदेशी को अपनाने, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को आगे बढ़ाया।

पाल ने लाला लाजपत राय तथा बाल गंगाधर तिलक के साथ बंग-भंग के विरोध में चलाये स्वदेशी आंदोलन में भाग लेकर स्वदेशी का समर्थन किया। इस आंदोलन में तिलक को गिरफ्तार कर लिया और अंग्रेजों ने स्वदेशी आंदोलन का दमन कर दिया, जिसके कारण वे वर्ष 1907 ई. में इंग्लैण्ड चले गए और श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा चलाए जा रहे क्रांतिकारी संगठन ‘इंडिया हाउस’ से जुड़ गए। यहीं स्वराज पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया।

अरविन्द घोष के ख़िलाफ़ गवाही देने से किया इंकार

जब क्रांतिकारी मदन लाल धींगरा ने सन 1909 में कर्ज़न वाइली की हत्या कर दी, तो इस पत्रिका का प्रकाशन बंद हो गया और लंदन में उन्हें काफ़ी मानसिक तनाव से गुज़रना पड़ा। इस घटना के बाद बिपिन चन्द्र पाल ने अपने आपको उग्र विचारधारा से अलग करने का निर्णय कर लिया। वंदे मातरम् राजद्रोह मामले में पाल ने म​हर्षि अरविन्द घोष के ख़िलाफ़ गवाही देने से इंकार कर दिया, परिणामस्वरूप उन्हें छह माह की सजा हुई।

अंग्रेजी हुकूमत पर से उनका विश्वास उठ गया था। उनका मानना था कि विनती और असहयोग जैसे हथियारों से विदेशी ताकत को पराजित नहीं किया जा सकता। इसी कारण गाँधी जी के साथ उनका वैचारिक मतभेद था। अपने जीवन के अंतिम कुछ सालों में वे कांग्रेस से अलग हो गए। उन्होंने कई मौक़ों पर महात्मा गांधी जैसे नेताओं की आलोचना भी की और उनके विचारों का विरोध भी किया। सन 1921 में गांधीजी की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था, ‘आपके विचार तार्किक नहीं, बल्कि जादू पर आधारित हैं’।

बिपिन चंद्र पाल की प्रमुख रचनाएं

बिपिन चंद्र पाल क्रांतिकारी होने के साथ-साथ एक कुशल लेखक, वक्ता और संपादक थे। अपने जीवन काल में उन्होंने कई रचनाएँ लिखी और कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया था।

पाल की कुछ प्रमुख रचनाएं इस प्रकार हैं:-

  • इंडियन नेशनलिज्म
  • नेशनलिटी एंड एम्पायर
  • द सोल ऑफ़ इंडिया
  • स्वराज एंड द प्रेजेंट सिचुएशन
  • द न्यू स्पिरिट
  • स्टडीज इन हिंदुइज़्म
  • क्वीन विक्टोरिया – बायोग्राफी
  • द बेसिस ऑफ़ रिफार्म

 बिपिन चंद्र के द्वारा संपादित प्रमुख पत्रिकाएं

  • परिदर्शक, 1880
  • बंगाल पब्लिक ओपिनियन, 1882
  • लाहौर ट्रिब्यून, 1887
  • द न्यू इंडिया, 1892
  • वन्देमातरम, 1906, 1907
  • द इंडिपेंडेंट, इंडिया, 1901
  • स्वराज, 1908 -1911
  • द डेमोक्रैट, 1919, 1920
  • बंगाली, 1924, 1925
  • द हिन्दू रिव्यू , 1913

बिपिन चंद्र पाल का निधन

महान क्रांतिकारी बिपिन चंद्र पाल का 20 मई, 1932 को पश्चिम बंगाल के कोलकाता में देहांत हो गया।

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