भगवती चरण वर्मा: ‘भूले बिसरे चित्र’ के लिए मिला साहित्य अकादमी पुरस्कार

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हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक भगवती चरण वर्मा की 5 अक्टूबर को 38वीं डेथ एनिवर्सरी हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य में उपन्यास, कहानियां सहित सभी विधाओं पर लेखन कार्य किया है। उनके उपन्यास ‘चित्रलेखा’ (1934) पर दो सफल हिंदी फिल्में बन चुकी हैं। उन्हें वर्ष 1961 में ‘भूले बिसरे चित्र’ उपन्यास के लिए हिंदी का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। भगवती चरण को उनके योगदान के लिए वर्ष 1971 में पद्म भूषण से नवाजा गया। उन्हें वर्ष 1978 में राज्यसभा के लिए भी नामित किया गया था।

आरंभिक जीवन

भगवती बाबू का जन्म 30 अगस्त, 1903 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के सफीपुर कस्बे में हुआ था। उनके पिता देवी चरण कानपुर में वकालत करते थे। वर्ष 1908 में कानपुर में फैले भयंकर प्लेग की वजह से उनके पिता की मृत्यु हो गई। उनका पालन—पोषण उनके ताऊ ने किया।

गांव की पैतृक संपत्ति बेचकर बैंक में जमा कराई और हर माह मिलने वाले ब्याज से परिवार का खर्च चलाया। उनका विवाह वर्ष 1923 में हुआ। वर्ष 1933 में उनकी पत्नी का देहांत हो गया, 1934 में उन्होंने दूसरा विवाह कर लिया।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा सफीपुर में संपन्न हुई थी। वर्ष 1921 में उन्होंने हाईस्कूल और 1924 में इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की। उनको उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय भेजा गया, यहीं से उन्होंने हिंदी साहित्य और कानून में स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

कॅरियर

वर्ष 1928 से 1942 के बीच उन्होंने कानपुर में वकालत की। बाद में वर्ष 1934 में उन्होंने ऐतिहासिक उपन्यास ‘चित्रलेखा’ लिखा। इस उपन्यास ने उन्हें साहित्य के क्षेत्र में प्रसिद्धि दिलाई। उन्होंने अपने साहित्यिक जीवन में 17 उपन्यास लिखे। उन्होंने कुछ समय के लिए कलकत्ता फिल्म कॉरपोरेशन में काम किया। उन्होंने बॉम्बे में स्क्रिप्ट राइटिंग का कार्य भी किया। बाद में एक हिंदी दैनिक नवजीवन का संपादन किया। उन्होंने 1957 में स्वतंत्र लेखन शुरू किया। उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो, लखनऊ में हिंदी सलाहकार के रूप में भी काम किया।

बाद में 1978 में उन्हें भारतीय संसद के उच्च सदन, राज्य सभा के लिए नामित किया गया।

निधन

5 अक्टूबर, 1981 को उनका निधन हो गया।

साहित्यिक रचनाएं

उपन्यास : भगवतीचरण वर्मा का पहला उपन्यास था पतन (1928) था। इसके अलावा अपने खिलौने, पतन, तीन वर्ष, चित्रलेखा, भूले बिसरे चित्र, टेढ़े मेढ़े रास्ते, सीधी सच्ची बातें, सामर्थ्य और सीमा, रेखा, वह फिर नहीं आई, प्रश्न और मरीचिका और आखिरी उपन्यास था सबहीं नचावत राम गोसाईं (1970) था।

कहानी संग्रह : मोर्चाबंदी, राख और चिनगारी, इंस्टालमेंट

संस्मरण : अतीत की गर्त से

नाटक : रुपया तुम्हें खा गया

आलोचना : साहित्य के सिद्धांत तथा रूप

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