देश की आजादी में क्रांतिकारी विचारों और पत्रकारिता से योगदान दिया था बारीन्द्र कुमार घोष ने

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आज 18 अप्रैल का देश के महान स्वतंत्रता सेनानी और पत्रकार बारीन्द्र कुमार घोष की 60वीं पुण्यतिथि है। उन्हें ‘बारिन घोष’ के नाम से प्रसिद्ध थे। उन्होंने बंगाल में आजादी की लड़ाई के दौरान क्रांतिकारी विचारधारा को फैलाया था। उनके इस कार्य में विवेकानंद के छोटे भाई भूपेन्द्र नाथ दत्त भी सहयोगी थे। परंतु देश की आजादी के बाद ने गुमनामी की जिंदगी जी थी।

जीवन परिचय :—
भारत माता के सपूत और क्रांतिकारी आंदोलन से देश की आजादी में योगदान देने वाले बारीन्द्र कुमार घोष का जन्म 5 जनवरी, 1880 को लंदन के पास नोरवुड में हुआ ​था। पिता का नाम कृष्णनाधन घोष और माता का नाम देवी स्वर्णलता था। उनके पिता एक प्रसिद्ध सर्जन और चिकित्सक थे। वे बाद में उनका परिवार भारत वापस आ गया।

अरविन्द घोष उनके तीसरे बड़े भाई थे जो पहले क्रांतिकारी थे लेकिन बाद में आध्यात्मवादी बन गए थे। उनके दूसरे बड़े भाई मनमोहन घोष थे जो अंग्रेजी साहित्य के विद्वान, कवि और कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज व ढाका विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर थे।

बा​रीन्द्र की प्रारम्भिक शिक्षा देवगढ़ में स्कूल में पूरी हुई। बाद में 1901 में प्रवेश परीक्षा पास की और पटना कॉलेज में दाखिला लिया। उन्होंने अपने बड़े भाई मनमोहन घोष के साथ ढाका में कुछ समय गुजारा। बड़ौदा में उन्होंने सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया। साथ ही उन्होंने इतिहास और राजनीति में पर्याप्त अध्ययन किया था। इसी समय अपने बड़े भाई अरविन्द घोष से प्रभावित हुए, जिसके कारण उनके मन में क्रांतिकारी विचारों ने जन्म लिया और वे क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने लगे।

देश की आजादी में बारीन्द्र कुमार घोष का योगदान

बारीन्द्र कुमार घोष एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी और पत्रकार थे। वे अपने बड़े भाई अरविन्द घोष से काफी प्रभावित थे जिन्होंने क्रांतिकारी विचारधारा को फैलाने में योगदान दिया था। 1902 में बारीन्द्र कुमार घोष कोलकाता लौट आए और जतिंद्रनाथ बनर्जी (बाघा जतिन) के सहयोग से ‘युगांतर’ नामक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की।

अनुशीलन समिति की बढ़ती लोकप्रियता के कारण दूसरा कार्यालय 1904 में ढाका में खोला गया, जिसका नेतृत्व पुल्लिन बिहारी दास और पी. मित्रा ने किया। ढाका में इसकी लगभग 500 शाखाएं थीं। इस समिति के ज्यादातर सदस्य स्कूल और कॉलेज के छात्र थे। सदस्यों को लाठी, तलवार और बन्दूक चलने का प्रशिक्षण दिया जाता था, हालाँकि बंदूकें आसानी से उपलब्ध नहीं होती थीं।

1906 में स्वदेशी आंदोलन के दिनों में उन्होंने युगांतर नाम से एक बंगाली साप्ताहिक और एक क्रांतिकारी पत्रिका प्रकाशित करना शुरू कर दिया। युगांतर का गठन अनुशीलन समिति के आंतरिक चक्र से किया गया और इसके आतंकवादी गतिविधियों को शुरू किया।

उनके इस कार्य और बंगाल में बढ़ती युगांतर की लोकप्रियता ने ब्रिटिश सरकार को उन पर शक होने लगा। 1907 में, उन्होंने बाघा जतिन और कुछ युवा क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं के साथ माणिकतला नामक स्थान पर उन्होंने बाम बनाने और हथियारों और गोला-बारूद इकट्ठा करना शुरू कर दिया, ताकि अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर सके।

उनके संगठन के सदस्य खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड की हत्या का प्रयास किया लेकिन वे असफल हो गये। इसके बाद पुलिस ने उन पर छानबीन शुरू की और जांच के माध्यम से 2 मई, 1908 को बारीन्द्र कुमार घोष और उनके कई साथियों को भी गिरफ्तार कर लिया गया।

बरिंदर कुमार घोष को अलीपुर बम कांड के मुकदमे में मौत की सजा सुनाई गई थी। बाद में यह सजा आजीवन कारावास में बदल दी गई और 1909 में अंडमान के सेलुलर जेल में भेज दिया गया। जहां पर सजा काटना मौत से भी ज्यादा भयानक था क्योंकि यह जेल अपनी क्रूरूर यातना के लिए जानी जाती है।

1920 में बारीन्द्र कुमार घोष को रिहा कर दिया गया। वे कलकत्ता आ गए और वहीं पर प्रिंटिंग हाउस खोल लिया और पत्रकारिता का कार्य करने लगे। बाद में उन्होंने कोलकाता में एक आश्रम स्थापित करने का फैसला किया और व्यवसाय से सेवानिवृत्त हो गए।

विवाह और मृत्यु

1933 में उन्होंने एक विधवा शैलजा दत्ता से विवाह कर लिया।
18 अप्रैल, 1959 में 79 वर्ष की अवस्था में उनका निधन हो गया।

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