मात्र आठ मिनट में गाना लिख दिया करते थे सु​प्रसिद्ध गीतकार आनंद बख्शी

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Lyricist-Anand-Bakshi

आनंद बख्शी उन गीतकारों में से एक थे जो बड़े कॉम्पिटीशन और समय की कसौटी पर खरे उतरे थे। लगभग 40 वर्षों तक लिखने और 4000 से अधिक गीतों को लिखने के बाद भी उनके हर एक गाने में एक नयापन झलकता था। आनंद बख्शी का जन्म आज ही के दिन यानी 21 जुलाई, 1930 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में हुआ था। बख्शी बचपन से फिल्मों के काफी शौकीन थे और हमेशा फिल्म इंडस्ट्री में शामिल होने के लिए मुंबई आने का सपना देखते थे। युवावस्था में उनका सपना था कि वे एक प्लेबैक सिंगर बने, लेकिन वक्त के साथ वे एक गीतकार बनकर भी उभरे। आइए आनंद बख्शी की 90वीं जन्म जयंती के अवसर पर जानते हैं कुछ दिलचस्प बातें..

चांद सा कोई चेहरा ना पहलू में हो

तो चांदनी का मज़ा नहीं आता

जाम पीकर शराबी ना गिर जाए तो

मयकशी का मज़ा नहीं आता

फिल्म इंडस्ट्री में शामिल होने के लिए घर से भागे

फिल्म इंडस्ट्री में शामिल होने के लिए आनंद बख्शी इतने भावुक थे कि वे घर से भाग गए थे और मुंबई पहुंचने के सपनों के साथ नौसेना में शामिल हो गए। लेकिन कराची में नौसेना का विद्रोह छिड़ा और वहां नेवी में उनका कॅरियर खत्म हो गया। वर्ष 1947 में भारत की कुल भूमि का कुछ क्षेत्र पाकिस्तान के रूप में विभाजित हुआ, जिसके बाद बख्शी का परिवार पाकिस्तान छोड़कर लखनऊ लौट आया। यहां उन्होंने टेलिफोन ऑपरेटर के रूप में अपना काम जारी रखा, लेकिन वह अभी भी मुंबई जाने का सपना आंखों में लिए हुए थे।

वह उन कुछ कवियों में से एक थे जिन्होंने कई तरीकों से प्यार का इजहार किया था। ‘अमर प्रेम’ से “चिंगारी कोई भड़के” हो या ‘दिल तो पागल है’ से “भोली सी सूरत”। आनंद बक्शी ने ‘डर’ के गाने “तू मेरे समाने” के जरिए एक रोमांटिक रिश्ते को भी बेहतरीन तरीके से बयां किया। बक्शी के लिए एक बेहतरीन दौर था जब उन्होंने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आरडी बर्मन की मदद से फ़र्ज़ (1967), दो रास्ते (1969), बॉबी (1973), अमर अकबर एंथनी (1977), एक दूजे के लिए (1981), कटी पतंग (1970), अमर प्रेम (1971) और हरे रामा हरे कृष्णा (1971) जैसी फिल्मों के लिए म्यूजिकल मास्टरपीस बनाए।

इनमें से अमर प्रेम में उनका काम विशेष रूप से उनका पसंदीदा था। शक्ति सामंत ने बख्शी को एक ‘कवि सम्मेलन’ में ‘चिंगारी कोई भड़के’ सुनाया और इसे विशेष रूप से फिल्म में शामिल किया। इस फिल्म की दूसरे माइलस्टोन में ‘बड़ा नटखट है’, ‘कुछ तो लोग कहेंगे’, ‘ये क्या हुआ’ और ‘रैना बीती जाए’ जैसे गाने शामिल हैं। राज कपूर की बॉबी और सत्यम शिवम सुंदरम, सुभाष घई की कर्ज़ (1980), हीरो (1983), कर्मा (1986), राम लखन (1989), सौदागर (1991), खलनायक (1993) को भी आनंद बख्शी ताल (1999) और यादें (2001) और यश चोपड़ा की चांदनी (1989), लम्हे (1991), डर (1993), दिल तो पागल है (1997) आदि फिल्मों के साथ भी उनका नाता रहा।

चार बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता

आपको बता दें कि आनंद बख्शी ने अपने जीवन में चार बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता जिसमें अपनापन (1977) (आदमी मुसाफिर है), एक दूजे के लिए (तेरे मेरे बीच में) दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे (1995, तुझ देखा तो ये जाना सनम) और ताल (इश्क बिना) जैसे एवरग्रीन गाने शामिल हैं।

2002 को आनंद बख्शी इस दुनिया को विदा कह गए और इंडस्ट्री में अपने 40 साल पूरे किए। दुनिया से रूखसत होने से पहले भी वे गीत ही लिखते रहे, उन्हीं शब्दों में खोए रहते थे।

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