सीबीआई के अलावा और कितने “तोते” सरकारी पिंजरे में कैद हैं?

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देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई अपनी साख पर लगे सवालों के बाद इन दिनों मीडिया में चर्चा का विषय बनी हुई है। सीबीआई के आला अधिकारियों के बीच हुई आपसी कलह जब खुलकर बाहर आई तो सरकारी महकमे में तहलता मच गया।

ऐसे में सवालों के इस दौर में जहां सीबीआई जैसी संस्थाओं की साख़ खतरे में हैं, वहीं अन्य संस्थानों पर भी सरकारी छाया बनी हुई है। स्वायत्तता, स्वतंत्रता और निष्पक्षता के दावे पर स्थापित की गई ऐसी तमाम संस्थाएं इन दिनों सरकारी दखलअंदाजी के दौर से गुजर रही हैं।

मीडिया में इन संस्थानों के लिए सरकारी तोता जैसे संबोधन भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ऐसे में हमारे लिए यह जानना जरूरी हो गया है कि कौन-कौनसी संस्थाएं सरकारी पिंजरे में कैद होकर काम कर रही हैं या ऐसे आरोप झेल रही हैं।

सैंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई)-

1941 में स्पेशल पुलिस इस्टेब्लिशमेंट के रूप में गठन होने के बाद साल 1963 में सीबीआई अस्तित्व में आया। हाल ही सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के बीच हुए विवाद के बाद फिर सीबीआई पर सरकारी दबाव में काम करने के आरोप लगे। फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में है, सीवीसी की जांच चल रही है।

केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी)-

सरकारी भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए साल 1964 में सीवीसी का गठन किया गया। गठन होने के बाद से ही समय-समय पर सीवीसी पर सरकारी तोता होने के आरोप लगते रहे हैं।

हाल ही में हुआ सीबीआई कांड भी अब सीवीसी के पास है, ऐसे में निष्पक्ष जांच को लेकर एक बार फिर सरकारी मिलीभगत होने के आरोपों का सिलसिला जारी है।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी)-

भारत में घोटालों को रोकने और आर्थिक कानूनों को लागू करने वाला संस्थान वित्त मंत्रालय के अधीन काम करता है।

हाल ही में ईडी के एक हाई प्रोफाइल अधिकारी ने देश के वित्त सचिव को एक पत्र भेजकर भूचाल ला दिया जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में जा पहुंचा। विवाद को और हवा जब मिली तब बीजेपी सांसद स्वामी ने ईडी के अधिकारी राजेश्वर सिंह का समर्थन किया।

भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई)-

कैंद्रीय रिज़र्व बैंक पर सरकारी दबाव और दखल के आरोप हमेशा से लगते रहे हैं। कई मामलों पर सरकार और रिज़र्व बैंक के अधिकारियों के बीच आपसी खींचतान देखी गई है। पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के कार्यकाल के दौरान रिजर्व बैंक सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा।

चुनाव आयोग (ईसी)-

संवैधानिक संस्था का तमगा लगाकर साल 1950 में चुनाव आयोग की शुरूआत की गई। पिछले कुछ समय से देश की विपक्षी पार्टियां चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सवालिया निशान लगा रही है।

इसी महीने की शुरुआत में चुनाव आयोग को पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का एलान करना था। आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए पूर्व निर्धारित समय को बदला और विपक्षी दलों ने आरोपों की बौछार कर दी। हाल में प्रधानमंत्री मोदी की अजमेर रैली को लेकर विधानसभा चुनावों की घोषणा के लिए 12.30 बजे की जगह 3 बजे रखी।

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